Wednesday, 8 July 2020

Mahashivratri kab h

शिवरात्रि का व्रत

Mahashivratri
Mahashivratri
जैसे ही शिवरात्रि नजदीक आती है हर शिवभक्त के मन मे भक्ति भाव की लहर दौड़ पड़ती है। कोई पूछता है कि शिवरात्रि कब है?शिवरात्रि हिंदुओं के लिए एक उत्सव का दिन होता है, इसमें रात भर शिवभक्त भगवान शिव की भक्ति में लीन रहते हैं।मनोकामना पूर्ति हेतु हमेशा से चली आ रही भक्ति विधि से भगवान शिव की भक्ति करते हैं। शिवलिंग की पूजा का यह पर्व पूरे भारत में लगभग सभी जगह मनाया जाता है जिसमें विशेष सामग्री जैसे दूध, बेलपत्र, फूल, फल आदि, शिव अभिषेक करके शिव लिंग पर चढ़ाया जाता है। भगवान शिव को इष्ट देव के रूप में मानने वाली भक्त आत्माएं इस उत्सव या व्रत को बड़े धूमधाम से मनाते हैं।
शिवरात्रि (Shivratri) क्या है?

शिवरात्रि ( Shivratri) को हिंदू धर्म में एक उत्सव की तरह मनाया जाता है। इसे माता पार्वती और भगवान शिव के भक्तों के लिए पर्व का उत्सव भी कहते हैं। इस दिन भगवान शिव को आराध्य मानने वाले भक्तों में उमंग रहती है। वे अपने अनुसार भगवान शिव की भक्ति करते हैं तथा उनको खुश करने के लिए उनके शिवलिंग की पूजा आराधना करते हैं। इसी दिन की रात में भगवान शिव को रातभर जगाने के लिए देवताओं ने एक उत्सव का आयोजन किया था। जिससे खुश होकर भगवान शिव ने देवताओ को शुभ आशीर्वाद दिया तभी से यह रात शिवरात्रि के नाम से प्रचलित है। जिसे महाशिवरात्रि के नाम से जाना जाता है।

शिवरात्रि (Shivratri) क्यों मनाई जाती है?

समुद्र मंथन, अमर अमृत का उत्पादन करने के लिए निश्चित था, लेकिन इसके साथ ही हलाहल नामक विष भी पैदा हुआ था। हलाहल विष में पूरे संसार को नष्ट करने की क्षमता थी और इसलिए केवल भगवान शिव इसे नष्ट कर सकते थे। भगवान शिव ने हलाहल नामक विष को अपने कंठ में रख लिया था। जहर इतना ज्वलनशील था कि भगवान शिव दर्द से पीड़ित थे और उनके गले का रंग नीला हो गया था। इस कारण से भगवान शिव ‘नीलकंठ‘ के नाम से प्रसिद्ध हुए।

उपचार के लिए, चिकित्सकों मुनियों ने देवताओं को भगवान शिव को रात भर जागते रहने की सलाह दी। इस प्रकार, देवतागण ने भगवान शिव के चिंतन में एक प्रयोजन रखा तथा भगवान शिव का ध्यान हटाने और रातभर जगाने के लिए उन्होंने अलग-अलग नृत्य और संगीत बजाए। जैसे ही सुबह हुई, उनकी भक्ति से प्रसन्न भगवान शिव ने उन सभी को आशीर्वाद दिया। शिवरात्रि इस घटना का उत्सव है, जिससे शिव ने दुनिया को बचाया। तब से इस दिन, भक्त उपवास करते है।
शिवरात्रि का व्रत:-
Shivratri एक अनोखा उत्सव है जिसमें लगभग सभी हिन्दू धर्म के व्यक्ति भाग लेते हैं। अपनी मनोकामना पूर्ति के लिए सब इस व्रत को करते हैं। इस व्रत को अलग-अलग स्थानों पर अलग-अलग विधि से मनाया जाता है जिनमें से एक विधि नीचे बताई गई है। इस दिन व्रत करने वाले व्यक्ति सुबह से लेकर अगली सुबह तक किसी प्रकार के आहार का सेवन नहीं करते। भगवान शिव की कथा सुनते हैं। भगवान शिव के शिवलिंग पर कच्चा दूध,बेलपत्र,फुल,फल आदि चढ़ाकर अपना व्रत पूरा करते है। जिससे उनको क्षणिक लाभ मिल जाते हैं।

भगवान से पूर्ण लाभ लेने के लिए हमें अपने शास्त्र के अनुसार भक्ति करनी होगी जिससे हमें जीवन पर्यंत मिलने वाले लाभ प्राप्त हो सकते है। शिवरात्रि के व्रत को करने से मिलने वाले लाभ का क्षणिक होने का कारण यह है कि यह हमारे शास्त्रों में जो भक्ति विधि लिखी है उनके विरुद्ध है।
Mahashivratri
Mahashivratri

हमारे शास्त्रों में लिखा है कि हमें किसी भी प्रकार के व्रत नहीं करना चाहिए। गीता अध्याय 16 श्लोक 23 में लिखा है कि जो व्यक्ति शास्त्रोंविधि को छोड़ कर मनमानी पूजा करते हैं उनको मोक्ष प्राप्त नहीं होता है.

गीता अध्याय 6 श्लोक 16 मैं लिखा है कि योग व भक्ति विधि ना तो बहुत अधिक खाने वाले की और ना ही बिलकुल ना खाने वाले की अर्थात उपवास व्रत करने की सिद्ध हो सकती है अर्थात व्रत करना सख्त मना है। फिर भी हम व्रत करते हैं जिसे हमें केवल क्षणिक लाभ मिलता है। इससे न तो हमारा मोक्ष होता है और न ही हमें जीवन पर्यंत लाभ मिलता है।

इस शिवरात्रि पर अवश्य जानिए की आखिर पूर्ण परमात्मा कौन है? 
आप को बता दें की अनंत ब्रह्मांडो के रचनाहार कबीर साहेब जी यानी कविर देव जी है। ये सभी आत्माओं के पिता है। इन्होंने ही 21 ब्रह्मांडो सहित असंख्य ब्रह्मांडो की रचना की है। ये हमें हमारे असली घर सतलोक का ज्ञान कराने के लिए समय समय पर या तो खुद यहां आते है या फिर अपने संत को काल के लोक में भेजते है. आज वर्तमान में संत रामपाल जी महाराज ही पूर्ण संत है। संत रामपाल जी महाराज की दया से ही हम वापस हमारे असली घर, शाश्वत स्थान सतलोक जा सकते है। अधिक जानकारी के लिए जरूर देखें साधना चैनल रोज शाम 7:30 से 8:30.



Wednesday, 1 July 2020

Raksha Bandhan fastival

Raksha Bandhan



राखी पर्व की मान्यता


भारत की सांस्कृतिक छटा ही निराली है। यहां के लोगों को हर प्रकार के त्यौहार मनाने में खुशी मिलती है। बहन द्वारा भाई की कलाई पर राखी बांधने की प्रथा अत्यंत पुरानी है। इस दिन बहन अपने भाई के मस्तक पर टीका लगाकर, कलाई पर राखी बांधकर उसकी दीर्घायु की कामना करती है। और भाई से अपनी सुरक्षा की उम्मीद। 

राखी आज भले ही पर्व के रूप में मनाया जाता है परंतु आपको यह जानकर आश्चर्य होगा की यह कोई पर्व नहीं है असल में रक्षाबंधन की परंपरा उन बहनों ने शुरू की थी जो सगी नहीं थीं।

आइए जानते हैं कैसे आरंभ हुई राखी मनाने की परम्परा
रक्षाबंधन सुनी सुनाई बातों पर आधारित त्योहार 

रक्षाबंधन की शुरुआत का सबसे पहला साक्ष्य रानी कर्णावती व सम्राट हुमायूँ को माना जाता है। जहां मध्यकालीन युग में राजपूत व मुस्लिमों के बीच संघर्ष चल रहा था। रानी कर्णावती चितौड़ के राजा की विधवा थीं। उस दौरान गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह से अपनी और अपनी प्रजा की सुरक्षा का कोई रास्ता न निकलता देख रानी ने हुमायूँ को राखी भेजी थी। तब हुमायूँ ने उनकी रक्षा कर उन्हें बहन का दर्जा दिया था। यहां तो हिंदू महारानी ने मुस्लिम राजा को धागा भेज अपने राज्य की रक्षा हेतु ऐसा किया था। इसे देखते हुए तो हमें सीख लेनी चाहिए कि हम हिंदू मुस्लिम एक-दूसरे के दुश्मन नहीं भाई बहन हैं। भले ही उस बहन ने अपने संरक्षण के लिए ऐसा किया था लेकिन उसी के कारण रक्षाबंधन एक पर्व के रूप में मनाया जा रहा है।

परमात्मा स्वयं करते हैं रक्षा
सूक्ष्म वेद के अनुसार द्रोपदी ने अपनी साड़ी को टुकड़ों में फाड़ कर घाट पर स्नान करने आए नेत्रहीन साधु (कबीर साहेब बनकर आए थे) की लाज बचाई थी। साधु ने आशीर्वाद दिया था जैसे आज तूने मेरी लाज रखी है परमात्मा तेरी लाज रखेगा।
द्वापर युग में जब कृष्ण भगवान ने दुष्ट राजा शिशुपाल को मारा था। युद्ध के दौरान कृष्ण के बाएँ हाथ की अँगुली से खून बह रहा था। इसे देखकर द्रोपदी बेहद दुखी हुईं और उन्होंने अपनी साड़ी का टुकड़ा चीरकर कृष्ण की अँगुली में बाँधा जिससे उनका खून बहना बंद हो गया। तभी से कृष्ण ने द्रोपदी को अपनी बहन स्वीकार कर लिया था। वर्षों बाद जब पांडव द्रोपदी को जुए में हार गए थे और भरी सभा में दुशासन उनका चीरहरण परिवार के बडे़ बूढों, चाचा, ताऊ, पांच पतियों की उपस्थिति में करना चाह रहा था तब द्रौपदी की रक्षा पूर्ण ब्रह्म कबीर साहेब जी ने अपने वचनानुसार कृष्ण जी के रूप में आकर की थी। पूरा श्रेय कृष्ण जी को मिला।
Raksha Bandhan
Raksha Bandhan

प्रत्येक युग गवाह है कि औरत को देवी का दर्जा देने वाले समय में भी औरत की सुरक्षा चिंता का विषय थी। तब भी उनकी रक्षा करने वाले परमात्मा स्वयं करते थे।
सर्व विदित है रावण ने अपनी बहन श्रुरूपनखा की कटी नाक का बदला राम और लक्ष्मण से लेने की ठानी तो रावण का क्या हाल हुआ। उसे अपनी जान तक गंवानी पड़ी। अपनी बहन की कटी नाक का किसी भी तरह से बदला लेने के लिए कुबुद्धि रावण ने राम जी की पत्नी सीता जी का हरण कर लिया था। जो भगवान विष्णु की पत्नी श्री लक्ष्मी जी का अवतार थीं और रावण शिवजी जी का कट्टर भक्त था फिर भी शिवजी के बड़े भाई की पत्नी को उठा ले गया था निर्लज्ज। अंत समय में स्वयं कबीर परमेश्वर ने अदृश्य रूप में रावण को मार गिराया और श्रेय राम जी को मिला।

मीरा के विवाह के बाद उसके पति की कुछ ही समय पश्चात मृत्यु हो गई थी। उसके देवर ने उसे तरह तरह के तंज दिए, मारना चाहा। विष तक पिला दिया था। कोई भाई उसके बचाव को नहीं आया था। केवल पूर्ण परमात्मा ने ही पल पल मीरा की रक्षा की। क्योंकि अंत में मीरा ने पूर्ण परमात्मा कबीर साहेब जी को अपना गुरु बनाया था।

आज के संदर्भ में राखी का नैतिक मूल्य व भाव दोनों बदल गए हैं।
प्रत्येक वर्ष लाखों बहनें दहेज के लालच में मार डाली जाती हैं। बलात्कार और ऐसिड अटैक की शिकार बनाई जाती हैं। क्या वह किसी की बहन नहीं होती?
निर्भया से लेकर जम्मू के कठुआ गैंग रैप की शिकार हुई बहन बेटियों ने न केवल अपनी इज्जत खोई बल्कि बलात्कार करने के बाद बलात्कारियों ने बेरहमी से उनका कत्ल भी किया। औरत बहन, बेटी, मां के रूप में कहीं भी सुरक्षित नहीं है। भाई सरीखे दिखने वाले ही चीर रहे हैं बहन की आबरू को। सरेआम लूटा जा रहा है उसके जिस्म को।
अनाथालयों में हज़ारों बच्चियों के साथ वहीं के संचालक दुष्कर्म करते हैं कोई भी भाई उनकी रक्षा करने नहीं आता। ऐसा प्रतीत होता है आज के समय की राखी केवल सगी बहन की रक्षा तक सीमट गई है। वह भी सगे भाई करने में असमर्थ हैं क्योंकि कभी भाई की मृत्यु पहले हो जाती है तो कभी किसी कारण से बहन की।

आइए जानते हैं कलयुग में कैसा है रक्षाबंधन का प्रारूप
❇कुछ समय पहले तक दूसरे की बहन को अपनी बहन समझने का भाव स्वत: ही मन में आ जाता था। परंतु अब समय ने भावनाओं, विचारों और मूल्यों की ऐसी पलटी खाई है कि अब समाज केवल अपने अपने रिश्तों तक सीमित हो गया है। अब दूसरे की बहन को हवस की नज़र से देखा जाता है। जहां लड़की अकेली देखी वहीं उसकी अस्मत पर हमला कर दिया जाता है। समाज में भाईचारा नहीं बलात्कार जैसी हैवानियत का राज चल रहा है।

❇आज रक्षाबंधन का प्रारूप बिल्कुल बदल गया है। इसमें समय के साथ साथ बाहरी आडंबर जुड़ते जा रहे हैं जिनमें बड़ा योगदान पंडितों का भी रहा है यह त्योहार उनकी जीविका का साधन है। राखी के दिन का समय/मुहूर्त पंडित निकालते हैं। बाज़ार रंग-बिरंगी राखियों से सज जाते हैं। बहनें पूरा हारश्रृंगार करती हैं। इसमें आधुनिकता तो आ गई है परंतु आध्यात्मिकता नदारद है। रक्षाबंधन का पर्व अब नकली प्रतीत होता है। मनुष्य यह भूल गया है की रक्षा तो केवल सर्वसृष्टि रचनहार परमात्मा ही कर सकता है क्योंकि उसी न बहन बनाई और भाई बनाया। हम पृथ्वी पर किसी और के सहारे जीवित नहीं हैं। केवल संस्कार वश बंधे हैं।

सभी त्योहार मानव द्वारा शुरू किए गए हैं इन्हें मनाने के आदेश और निर्देश परमात्मा के नहीं हैं।
अब राखी बांधने और बंधवाने वालों के पास इस पर्व को मनाने का समय नहीं रहा है। भाई बहन अलग-अलग देशों में रहते हैं तो रक्षा करना व कराना दोनों व्यर्थ लगता है।
शुरूआत में उसका उद्देश्य केवल परपुरुष से राज्य व जीवन की रक्षा थी, या पत्नी द्वारा युद्ध के समय अपने पति की विजय कामना। अब यह केवल मनोरंजक त्योहार बन कर रह गया है। देश के राष्ट्रपति व प्रधानमंत्री स्कूली बच्चियों से रक्षाबंधन का सूत्र बंधवा कर भाईचारे व बेटियों के उज्ज्वल भविष्य की कामना का पैगाम देते हैं। परंतु सच तो यह है कि बहनों की सुरक्षा की जिम्मेदारी यहां राष्ट्रपति से लेकर प्रधानमंत्री तक कोई भी व्यक्ति कर सकने में सक्षम नही है। रक्षा तो केवल परमात्मा ही कर सकता है और वही एक है जो करता है। जिसने मां के गर्भ में भी हमारा पालन-पोषण किया। जीवन और मृत्यु दोनों परमात्मा के हाथ में हैं। इतिहास गवाह है रक्षा तो केवल परमात्मा या परमात्मा का भेजा सदगुरू तत्वदर्शी संत ही कर सकते हैं और करते भी हैं। पूर्ण सन्त उसी व्यक्ति को शिष्य बनाता है जो सदाचारी रहे। तत्वदर्शी संत का शिष्य सामाजिक बुराईयों से सदा दूर रहता है दूसरे की बहन मां, बेटी को अपनी बहन बेटी के समान देखता है। कबीर परमात्मा कहते है :-

पर नारी को देखिए, बहन बेटी के भाव ।
कहे कबीर काम नाश का, यही सहज उपाय ।।

दूसरे की स्त्री को अपनी बहन, बेटी के भाव से देखें, जिससे पर स्त्री को देखकर उठने वाली काम वासना स्वत: नष्ट हो जाती है।
जब-जब धर्म की हानि होती है व अधर्म की वृद्धि होती है तथा वर्तमान के नकली संत, महंत व गुरुओं द्वारा भक्ति मार्ग के स्वरूप को बिगाड़ दिया गया होता है। फिर परमेश्वर स्वयं आकर या अपने परमज्ञानी संत को भेज कर सच्चे ज्ञान के द्वारा धर्म की पुनः स्थापना करता है। इस समय पृथ्वी पर मौजूद एकमात्र “तत्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज” जी हैं जो अपने सतज्ञान के द्वारा अपने शिष्यों को बुराइयों से बचने की शिक्षा देते हैं। सभी भाईयों को चाहिए अपनी बहन को तत्वदर्शी संत से नाम दीक्षा दिलवाए। यदि बहन को पहले तत्वज्ञान समझ आ गया है तो भाई को सदगुरु देव जी से नाम दीक्षा दिलवाए।
Raksha Bandhan
Raksha Bandhan

हमें अपने आस पास हो रही घटनाओं से सबक लेते हुए यह समझना होगा की यह स्थान जहां हम रह रहे हैं यह मृतलोक है यहां कुछ स्थाई नहीं है। यह स्थान रहने लायक नहीं है। हम झूठे क्षणिक सुखों में खुशियां ढूंढते रहते हैं।

झूठे सुख को सुख कहे, मानत है मन मोद
खलक चबैना काल का, कुछ मुंह में कुछ गोद।।

कबीर जी समझाते हैं कि अरे जीव ! तू झूठे सुख को सुख कहता है और मन में प्रसन्न होता है? देख यह सारा संसार मृत्यु के लिए उस भोजन के समान है, जो कुछ तो काल के मुंह में है और कुछ गोद में खाने के लिए रखा है।

पंचमुखी ब्रह्मा जी ने अपनी ही बेटी को बदनियत से आलिंगन किया जिस कारण शिव के कहने पर उनको शरीर छोड़ना पड़ा और फिर विष्णु जी की नाभि से दोबारा जन्म लेना पड़ा। जहां पृथ्वी से लेकर स्वर्ग लोक तक स्त्री किसी भी रूप में सुरक्षित नहीं वहां रक्षाबंधन का त्यौहार केवल नाम का लगता है।

कबीर, लूट सकै तो लूटिले, राम नाम है लूटि।
पीछै फिरि पछिताहुगे, प्राण जाँयगे छूटि।।

इस समय परमात्मा धरती पर हम जीवों की रक्षा और उद्धार करने स्वयं सतलोक से आए हैं। जो परमात्मा को पहचान कर उनकी शरण में आ जाएगा उसका बाल भी बांका नहीं होगा। बहन, भाई, माता पिता, बेटी सभी को परमात्मा कबीर जी की शरण में लाओ और हर बंधन से छुटकारा तो मिलेगा और रक्षा भी सर्व सृष्टि रचनहार करेगा। यदि जीवन में सुरक्षा चाहिए तो असली बंधन परमात्मा से ही बनाना होगा।
संत रामपाल जी महाराज परमेश्वर कबीर जी के आध्यात्मिक ज्ञान को जनजन तक पहुँचा रहे हैं। ताकि मानव जाति विकार रहित होकर परमात्मा की भक्ति करे। संत रामपाल जी महाराज जी के विचारों को सुनकर लाखों व्यक्ति सर्व बुराई त्यागकर सत भक्ति करते हुए परमात्मा पर आश्रित हो चुके हैं। क्योंकि राम, शिव, ब्रह्मा, विष्णु कोई भी किसी बहन की सहायता और रक्षा करने में सक्षम नहीं हैं। ये भी परम शक्ति पर निर्भर हैं। रक्षा प्रत्येक की हो सकती है जो पूर्णतया परमात्मा पर आश्रित होकर सतभक्ति करेगा।
Raksha Bandhan
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जिसके हाथ में जन्म मृत्यु की डोर है, बंधन उसी से जोडो, रक्षा स्वयं करेगा।

Wednesday, 24 June 2020

Temple of Jagannath


जगन्नाथ मंदिर की स्थापना

जगन्नाथ मंदिर किसने बनवाया?
आइए आज हम जानेंगे जगन्नाथ मंदिर की पूरी कहानी कि कैसे बना यह जगन्नाथ मंदिर और इसे बनाने में क्या क्या परिस्थितियां उत्पन्न हुई तथा इन परिस्थितियों को से किस प्रकार निपटा गया।
Jagannath
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उड़ीसा प्रांत का राजा इंद्रदमन चिंतित था क्योंकि श्री कृष्ण जी ने स्वपन में आकर स्थान बताते हुए कहा था कि इंद्रदमन समुद्र किनारे एक मंदिर बनवाओ जिसमें मूर्ति पूजा नहीं होनी चाहिये। सिर्फ मंदिर में एक संत नियुक्त करो जो दर्शकों को गीता जी का पाठ सुनाया करेगा। लेकिन प्रतिशोध के चलते समुंद्र जगन्नाथ पुरी के मंदिर को तोड़ने की अपनी ज़िद पर कायम था क्योंकि त्रेतायुग में समुंद्र ने राम को रास्ता नहीं दिया था। तब राम ने क्रोधवश समुन्द्र को नष्ट करने के लिए डराया धमकाया था और उसी का बदला लेने के लिए अब समुंद्र बार बार जगन्नाथ पुरी मंदिर निर्माण में बाधक बन रहा था।   राजा ने कृष्ण जी के आदेश अनुसार 5 बार मंदिर बनवाने की कोशिश की पर समुंद्र बड़े वेग से भीषण तूफान सरीखा उठकर आता और मंदिर को बहाकर ले जाता। राजा ने श्री कृष्ण से बार-बार मदद की विनती की लेकिन श्री कृष्ण जी भी समुंद्र को रोकने में असमर्थ रहे। धीरे धीरे राजा का खजाना भी खत्म हो गया और उसने मंदिर नही बनवाने का निर्णय लिया।

कबीर परमात्मा का संत रूप में आना-:

एक दिन कबीर परमात्मा संत रुप में राजा के पास आये और राजा को कहा की अब तुम मंदिर बनवाओ मैं तुम्हारे साथ हूं। अबकी बार समुंद्र मंदिर नहीं तोड़ेगा। राजा ने कहा की जब भगवान श्री कृष्ण जी समुंद्र को नहीं रोक पाये तो आप क्या कर पाओगे! कबीर परमेश्वर ने कहा की मुझे उस परमेश्वर की शक्ति प्राप्त है जिसने सर्व ब्रह्मांडो की रचना की है और वही समरथ प्रभु असंभव को भी संभव कर सकता है अन्य देवता नहीं। राजा ने कबीर परमात्मा की बात नहीं मानी तो कबीर जी ने अपना पता बताते हुए कहा की जब भी मंदिर बनाने का मन बने तो मेरे पास आ जाना। आखिर श्री कृष्ण जी ने राजा को स्वपन में आकर कहा की वह जो संत आया था उसकी शक्ति का कोई वार पार नहीं वह मंदिर बनवा देगा, उससे याचना करो, फिर इंद्रदमन ने कबीर जी से विनती की तो कबीर जी ने मंदिर बनवाना शुरु करवा दिया, समुंद्र भी मंदिर तोड़ने के लिए बड़े तीव्र वेग से उठकर आता और विवश होकर थम जाता क्योंकि कबीर परमात्मा अपना हाथ ऊपर को उठाते और अपनी शक्ति से समुंद्र को रोक देते।
Jagannath
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फिर समुंद्र कबीर जी से याचना करता की मैं आपके समक्ष निर्बल हूं आप से नहीं जीत सकता लेकिन मैं अपना प्रतिशोध कैसे लूं, उपाय बताएं ? तब कबीर जी ने द्वारिका को डुबोकर गुस्सा शांत करने का विकल्प बताया क्योंकि द्वारिका खाली पड़ी थी। जिस स्थान पर कबीरजी ने समुंद्र को रोका था वहाँ आज भी एक गुम्बद यादगार के रूप में मौजूद है जहाँ वर्तमान में महंत रहता है।

कबीर परमात्मा द्वारा मूर्तियां बनाना:-

इसी दौरान नाथ परंपरा के एक सिद्ध महात्मा आये और राजा से कहा की मूर्ति बिना मंदिर कैसा, आप चंदन की लकड़ी की मूर्ति बनाओ और मंदिर में स्थापित करो, राजा ने तीन मूर्तियां बनवाई जो बार बार टूट जाती थी। इस तरह तीन बार मूर्ति बनवाई और तीनों बार खंड हो गई तो राजा फिर चिंतित हुआ। सुबह जब राजा दरबार में पहुँचा तो कबीर परमात्मा एक मूर्तिकार के रुप मे आये और राजा से कहा कि मुझे 60 साल का अनुभव है, मैं मूर्तियां बनाउंगा तो नहीं टूटेंगीं। मुझे एक कमरा दे दो जिसमें मैं मूर्तियां बनाउंगा और जब तक मूर्तियां नहीं बन जाती कोई भी कमरा ना खोले। राजा ने वही किया, उधर कुछ दिन बाद नाथ जी फिर आए और उनके पूछने पर राजा ने पूरा वृतांत बताया तो नाथ जी ने कहा की पिछले 10-12 दिन से वह कारीगर मूर्ति बना रहा है, कहीं गलत मूर्तियां ना बना दे। हमें मूर्तियां को देखना चाहिये, यह सोचकर कमरे में दाखिल हुए तो कबीर परमात्मा गायब हो गये, तीनों मूर्तियां बन चुकी थी लेकिन बीच में ही व्यवधान उत्पन्न होने से तीनों मूर्तियों के हाथ और पांव की ऊँगलियां नही बनी थीं। इस कारण मंदिर में बगैर ऊँगलियों वाली मूर्तियां ही रखी गईं।
Jagannath
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कुछ समय उपरांत जगन्नाथ पुरी मंदिर में मूर्तियों की प्राण प्रतिष्ठा करने के लिए कुछ पंडित मंदिर में पहुँचे। मंदिर के द्वार की ओर मुंह करके कबीर परमात्मा खड़े थे। पंडित ने कबीर परमात्मा को अछूत कहते हुए धक्का दे दिया और मंदिर में प्रवेश किया। अंदर जाकर देखा तो हर मूर्ति कबीर परमात्मा के स्वरुप मे तब्दील हो गई थी और यह देखकर पंडित हैरान थे। बाद मे उस पंडित को कोढ़ हो गया जिसने कबीर परमात्मा को धक्का देकर अछूत कहा था। लेकिन दयालु कबीर परमात्मा जी ने बाद में उसे ठीक कर दिया। उसके बाद जगन्नाथ पुरी मंदिर में छुआछात नहीं हुई।

कबीर साहिब ही पूर्ण परमात्मा है-:

कबीर परमात्मा ने यहाँ सिद्ध करके बताया की वह समर्थ है और ब्रह्मा, विष्णु और महेश से ऊपर की शक्ति है। कबीर परमात्मा चारों युग में सतलोक से गति करके आते हैं सतयुग में सतसुकृत नाम से, त्रेता में मुनिंद्र नाम से, द्वापर में करुणामय नाम से, और कलयुग में अपने असली नाम कबीर (कविर्देव) नाम से आते हैं और यही सत्य वर्तमान मे भी संत रामपालजी महाराज ने बताया है की आत्मकल्याण तो केवल पवित्र गीता जी व पवित्र वेदों मे वर्णित तथा परमेश्वर कबीर के द्वारा दिये गये तत्वज्ञान के अनुसार भक्ति साधना करने मात्र से ही सम्भव है अन्यथा शास्त्र विरुद्ध होने से मानव जीवन व्यर्थ हो जाएगा।
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श्री जगन्नाथ के मन्दिर में प्रभु के आदेशानुसार पवित्र गीता जी के ज्ञान की महिमा का गुणगान होना ही श्रेयकर है तथा जैसा श्रीमद्भगवत गीता जी में भक्ति विधि है उसी प्रकार साधना करने मात्रा से ही आत्म कल्याण संभव है, अन्यथा जगन्नाथ जी के दर्शन मात्र या खिचड़ी प्रसाद खाने मात्र से कोई लाभ नहीं क्योंकि यह क्रिया श्री गीता जी में वर्णित न होने से शास्त्रविरुद्ध हुई, जो अध्याय 16 मंत्र 23,24 में प्रमाण है।

Wednesday, 17 June 2020

Janmashtami: Shiri krishna

Krishan Janmashtami


हिन्दू धर्म के प्रमुख ईष्ट देव भगवान हैं श्री कृष्ण जी।प्रभुप्रेमियों के दिलों में श्रीकृष्ण जी का विशेष स्थान है। विष्णु जी के अवतार कृष्ण जी श्रावण माह की कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मध्यरात्रि को अत्याचारी कंस का विनाश करने के लिए पृथ्वी पर अवतरित हुए थे। इसलिए इस दिन को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के रूप में मनाया जाता है। पूरे भारतवर्ष में आज 3 सितंबर को कृष्ण जन्माष्टमी मनाई जा रही है। कोई कृष्ण को लल्ला, कान्हा, माखनचोर, सांवलिया, लड्डू गोपाल तो कोई कृष्णा कह कर प्रेम से पुकारता है। जन्माष्टमी पर श्रीकृष्ण की जन्म नगरी मथुरा भक्ति के रंगों में जीवंत हो जाती है।




लोकवेद के अनुसार:-जन्माष्टमी पर स्त्री पुरुष 12:00 बजे तक व्रत रखते हैं। इस दिन मंदिरों में झांकियां सजाई जाती हैं और भगवान कृष्ण को झूला झुलाया जाता है। और रासलीला का आयोजन होता है।
स्कन्द पुराण के मतानुसार जो भी व्यक्ति जानकर भी कृष्ण जन्माष्टमी का व्रत नहीं करता, वह मनुष्य जंगल में सर्प और व्याघ्र होता है। भविष्य पुराण का वचन है- भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष में कृष्ण जन्माष्टमी व्रत को जो मनुष्य नहीं करता, वह क्रूर राक्षस होता है। एक मान्यता के अनुसार आधी रात के समय रोहिणी में जब कृष्णाष्टमी हो तो उसमें कृष्ण का अर्चन और पूजन करने से तीन जन्मों के पापों का नाश होता है। लेकिन कृष्ण जी खुद अपने कर्म के पाप प्रभाव को नहीं काट सके तो भक्तों के कैसे काटेंगे। (पुराणों में लिखित मत ब्रह्मा जी का है पूर्ण ब्रह्म परमात्मा का नहीं है।)
जिस समय गीता जी का ज्ञान बोला जा रहा था, उससे पहले न तो अठारह पुराण थे, न ग्यारह उपनिषद् और न ही छः शास्त्र थे। उस समय केवल पवित्र चारों वेद ही शास्त्र रूप में प्रमाणित थे और उन्हीं पवित्र चारों वेदों का सारांश पवित्र गीता जी में वर्णित है।

श्री कृष्ण जी तथा कबीर साहेब की लीलाएं:-


Krishan Janmashtami
Krishan Janmashtami

श्रीकृष्ण जी की बचपन में परवरिश गायों के दूध और मक्खन से हुई थी और कबीर साहिब जी की परवरिश वेदो अनुसार कुमारी गाय के दूध से हुई।
Krishan Janmashtami
Krishan Janmashtami
कबीर साहिब जी ने मृत कमाल और कमाली को जीवित कर दिया जबकि श्री कृष्ण जी अपने भांजे अभिमन्यु को जीवित न कर सके । जो कि सिर्फ पूर्ण परमात्मा ही कर सकता है
Krishan Janmashtami
Krishan Janmashtami
श्री कृष्ण जी बांसुरी बजाते थे तो आसपास की गोपियां और गाय इकट्ठे होकर सुनते थे लेकिन जब कबीर परमात्मा ने यमुना के किनारे एक बार बांसुरी बजाई तो यमुना का पानी स्थिर हो गया सभी पशु पक्षी यहां तक कि आसमान में देवता भी उस बांसुरी की मधुर आवाज सुनने के लिए पृथ्वी पर आ गए।
Krishan Janmashtami
Krishan Janmashtami
श्री कृष्ण जी महाभारत का युद्ध चाह कर भी नहीं रुकवा सके और उसमें करोड़ों लोग मर गए वही कबीर साहिब जी ने अपने अंतिम समय में हिंदू मुस्लिम के बीच होने वाले महाविनाश को भी रोक लिया
Krishan Janmashtami
Krishan Janmashtami
यह अवधारणा है कि द्रौपदी जी की साड़ी कृष्ण ने बढ़ाई थी, एक अर्ध सत्य है! सत्य तो यह है कि उस समय कृष्ण जी रुक्मणी के साथ चौरस खेल रहे थे यह सारा खेल कबीर भगवान ने किया और भक्ति की लाज रखी द्रौपदी जी की साड़ी बढ़ाकर।

असली वासुदेव कौन है?
श्री कृष्ण जी तीन लोक के भगवान होने के कारण त्रिलोकीनाथ कहलाते हैं
 कबीर साहेब कुल मालिक होने के कारण वासुदेव कहलाते हैं कबीर परमात्मा सर्वशक्तिमान है वहीं सृष्टि रचना है परमात्मा सतलोक में रहते हैं जहां सुख ही सुख है वहां सभी आपस में प्रेम से रहते हैं


Krishan Janmashtami
Krishan Janmashtami
श्री कृष्ण जी 16 कला के स्वामी थे जबकि कबीर साहिब अनंत कला के स्वामी हैं।

Krishan Janmashtami
Krishan Janmashtami

दुर्वासा ऋषि द्वारा दिए गए शराब के कारण पूरा यादव कुल नाश को प्राप्त हो गया वह खुद श्री कृष्ण जी भी।
वे अपने कुल को बचा नहीं पाए तो फिर इन्हें भगवान मानने में शंका होती है?

गीता में तत्वदर्शी संत की खोज कर भक्ति करने को कहा है।
पूर्ण ब्रह्म की भक्ति के लिए पवित्र गीता अ. 4 श्लोक 34 में पवित्र गीता बोलने वाला (ब्रह्म) प्रभु स्वयं कह रहा है कि पूर्ण परमात्मा की भक्ति व प्राप्ति के लिए किसी तत्वज्ञानी सन्त को ढूंढ ले फिर वह जैसे विधि बताएं वैसे कर।
Krishan Janmashtami
Krishan Janmashtami
पवित्र गीता जी को बोलने वाला प्रभु कह रहा है कि पूर्ण परमात्मा का पूर्ण ज्ञान व भक्ति विधि मैं नहीं जानता। अध्याय 15 श्लोक 4 तथा अध्याय 18 श्लोक 62 व 66 में किसी अन्य परमेश्वर की शरण में जाने को कहा है।(इसका सार यह है कि तत्वदर्शी संत की खोज करो और जैसे भक्ति विधि वह बताए उसी अनुसार करते हुए मोक्ष को प्राप्त हो जाओगे)

Friday, 12 June 2020

Let's know Buddhism

बौद्ध धर्म के प्रवर्तक महात्मा बुद्ध


महात्मा गौतम बुद्ध एक पुण्यकर्मी प्राणी थे जो स्वर्ग लोक से आए थे। लोगों की आम धारणा है कि स्वर्ग प्राप्ति ही पूर्ण मोक्ष है जबकी स्वर्ग प्राप्ति तो अपने पुण्य खर्च करने का एक ज़रिया मात्र है! स्वर्ग में जो सुविधाएं उपलब्ध हैं वो यहाँ (पृथ्वीलोक) में कहां।
जो सुविधाएं पृथ्वीलोक में उपलब्ध हैं उसकी तुलना में स्वर्ग उच्च कोटी का स्थान है जहाँ आनंद भोगा जा सकता है जिन इच्छाओं का दमन पृथ्वी लोक में “तप” समझ कर किया जाता है
उन्हीं इच्छाओं की पूर्ति स्वर्ग में आसानी से हो जाती है क्योंकि साधक समझता है की यही मेरा मोक्ष है और मैं अपने पृथ्वी लोक में किए तप और त्याग का लाभ /फल भोग रहा हूं जो स्थाई और अमर है! लेकिन सच तो यह है की तप और साधना से जो पुण्य कमाए थे स्वर्ग में पुण्य कर्मों का कोटा पुरा होते ही पृथ्वीलोक (मृत्युलोक) में वापस फेंक दिया जाता है। जिस तरह महात्मा गौतम बुद्ध के पुण्य खत्म होते ही उन्हें वापस पृथ्वीलोक पर आना पड़ा।
परमात्मा प्राप्ति के लिए घर त्यागना उचित है या अनुचित:-

स्वर्ग से पृथ्वी लोक पर आने के बाद सर्व सुविधाओं का अभाव महसूस होने लगता है इसलिए आत्मा के अंदर वही सर्व सुविधाएं प्राप्त करने की कसक बनी रहती है जबकी वास्तविकता तो यह है कि यह कसक तो परमात्मा प्राप्ति कि है जो जीव को अनादि काल से ही बनी हुई है लेकिन पूर्ण भक्ति मार्ग ना मिलने से महत्वकांक्षाओं की पूर्ति में ही जीवन समाप्त हो जाता है और अगर कुछ भक्ति बनी भी तो जीव को पता भी नहीं चलता कि कब उसके पुण्य कर्म कहाँ खर्च हो गए और फिर स्वर्ग जैसे स्थान पर साधक की पुण्य कमाई समाप्त होते ही वापस पृथ्वी लोक में भेज दिया जाता है। महात्मा गौतम बुद्ध ने भी इसी कसक में घर और राज त्यागा था और बिहार राज्य में “गया” नामक शहर के बाहर एक वट वृक्ष के नीचे मनमुखी साधना शुरु कर दी थी।
इसी मनमुखी साधना के कारण शास्त्र अनुकूल साधना एवं वास्तविक मोक्ष मार्ग पर ताला पड़ गया और साधक कभी भी अपने निजधाम सतलोक नहीं पहुँच पाया क्योंकि गलत मार्गदर्शन में वह भ्रमित होकर गलत भक्ति में प्रवृत्त हो गया।

भुखा रहने या व्रत करने से भगवान मिल सकता है ?
महात्मा गौतम बुद्ध काफी समय तक निराहार बैठा रहा, हाथ पांव हिलना बंद हो गये, शरीर नर-कंकाल सरीखा हो चला और धीरे धीरे मृत्यु के निकट पहुँच गया। किसी दयावान माई ने बुद्ध के मुँह पर खीर लगा दी सोचा शायद इसके प्राण बच जाएं। बुद्ध ने वह खीर चाटनी शुरु कर दी, पहले दिन 10 -20 ग्राम, दुसरे दिन 50 -60 ग्राम, और तीसरे दिन आंख खुली तो उठकर चल पड़ा। बुद्ध को पता चला की, “भूखे रहकर साधना नहीं की जा सकती” तो अपने इस अनुभव से उसने विधान बना दिया की भूखे मरने से कल्याण संभव नहीं! तथा इसी को लोग बुद्ध की निर्वान प्राप्ति के नाम से जानते हैं। बुद्ध को ध्यान में एक रोशनी दिखाई दी जिसे आज लोग ‘डिवाइन लाइट’ कहते हैं। पर जैसे किसी खेत की सफाई करने के बाद यदि उसमे फसल नही बोई जाई तो उसमें झाड़िया उग जाती हैं उसी तरह बुद्ध अच्छी आत्मा के थे मतलब एक तरह से उनका खेत साफ था पर सही भक्ति रूपी फसल नही बीजने से उन्हें झाड़ी रूपी रोशनी दिखाई देने लगी जिसका मोक्ष मार्ग में कोई स्थान नहीं था।

सबकुछ अपने आप ही होता है या भगवान है ?
जब महात्मा बुद्ध के निर्देश अनुसार भक्ति करने से कोई लाभ नहीं हुआ तो सब ने यह मान लिया की भगवान है ही नहीं अपना काम करो और खाओ, बस। अब यहां यह समझना होगा कि बुद्ध की क्रिया के अनुसार उन्हें भगवान नहीं मिला तो इसका मतलब यह है कि भगवान पाने का उनका तरीका गलत था ना कि ये की भगवान होता ही नहीं है। लेकिन बुद्ध के कारण लोगों की मानसिकता यह बन गई की भगवान नहीं होता है सर्व ब्रह्मांड, सृष्टि, जीव-जंतु, पशु-पक्षी, सब अपने आप ही बनता और बिगड़ता है कोई कुछ नहीं है यहां पर? जीव अपने आप ही उत्पन्न होता है और नष्ट हो जाता है और भगवान है ही नहीं। लोगों ने उनकी बातों में आकर कहा कि सब भ्रमणा है और फिर यही नकारात्मक मानसिकता के आधार पर एक सिंद्धांत बन गया जो कई लोगों का अनमोल मनुष्य जीवन बर्बाद कर गया और इसके कारण कई देश जैसे चीन, म्यांमार
आदि नास्तिकता के घोर अंधेरे में चले गए और भगवान और मोक्ष से कोसों दूर हो गए।

यथार्थ ज्ञान:-
जबकि यथार्थ ज्ञान तो इससे बहुत भिन्न है कि परमात्मा है और उसकी शास्त्र अनुकूल साधना करने से ही पूर्ण मोक्ष प्राप्त हो सकता है अन्य भक्ति करने से नहीं। बुद्ध के द्वारा बनाए गए स्वयंमुखी मार्ग पर चल कर कोई भी व्यक्ति परमेश्वर प्राप्ति नहीं कर सकता। हठ योग से सांसारिक सुखों व देह त्याग तो संभव है परंतु ईश प्राप्ति कदापि नहीं। युगों की पुण्यकर्मी प्यासी और तरसती आत्मा परमात्मा के दर्शन मात्र के लिए अपना सब कुछ न्यौछावर करने को तत्पर रहती है। पर सही गुरु व सतमार्ग का अभाव जीव के असंख्य दुखों का कारण बनता है।

महात्मा बुद्ध के कोई गुरु नहीं थे!
बिना गुरु के कभी ज्ञान नहीं होता यह सर्वमान्य है लेकिन फिर भी बुद्ध ने गुरु महिमा को नकार कर स्वयं ही एक धर्म को जन्म दिया महात्मा बुद्ध का कोई गुरु नहीं था उन्होंने परमात्मा प्राप्ति के लिए अपने अनुसार ही भक्ति शुरू की जो शास्त्र विरुद्ध साधना थी हमारे ग्रंथों में लिखा है अगर कोई शास्त्र विरुद्ध साधना करता है उसे न तो कभी सुख की प्राप्ति होती है और ना ही उसका मोक्ष होता है महात्मा बुद्धएक पुण्यात्मा थी लेकिन शास्त्र विरुद्ध भक्ति करने से उन्हें कोई लाभ प्राप्त नहीं हुआ उन्होंने वही भक् अपने शिष्यों को दी
 इसका परिणाम यह हुआ कि उनके अनुयायियों का भगवान से विश्वास उठ गया बुद्ध ने हमेशा अहिंसा का पाठ पढ़ाया लेकिन उनके अनुयाई अहिंसा का पाठ ने पढ़कर हिंसा पर उतारू हो गए और निर्दोष चीजों की निर्मम हत्या करने लगे यह दुर्भाग्य की बात है

कि गौतम बुद्ध जी जिन्हें बहुत बड़ा महात्मा माना जाता था वह बिल्कुल ही ज्ञान हीन थेऔर करोड़ों संख्या में लोगों को नास्तिक बना दिया जिससे दुनिया विनाश की कगार पर खड़ी है।

संत रामपाल जी महाराज द्वारा बताया गया शास्त्र अनुकूल ज्ञान
परमेश्वर प्राप्ति के लिए कलयुग में परमात्म स्वयं सतलोक से धरती पर अवतरित हुए हैं। पूर्ण परमात्मा कबीर साहेब हैं जो सतलोक में सशरीर ऊँचे सिंहासन पर विराजमान हैं, जिन्होंने सर्व ब्रह्माण्डों की उत्पत्ति करके मनुष्य को अपने स्वरुप के अनुसार बनाया। मोक्ष का सतमार्ग जानने के लिए परमेश्वर कबीर जी द्वारा बताए भक्ति मार्ग पर चलिए व ज्ञान समझ कर ग्रहन करें परमात्मा स्वयं मिल जाएंगे। यही सच वर्तमान में संत रामपाल जी महाराज ने बताने की कोशिश की तो सत्य बोलने की उन्हें भारी कीमत चुकानी पड़ी। उन्होनें जन-जन को यही बताया की पिछले जन्मों के पुण्यकर्मी संस्कारी प्राणी ही परमात्मा की तड़प में घर त्याग देते हैैं और जो भी कोई जैसा भी मार्गदर्शन करता है साधक वैसी ही साधना करने लगता है। जिससे ना ही उसे सुख की प्राप्ति होती है और ना ही से मोक्ष का पता होता है
आइए संत रामपाल जी महाराज जी का ज्ञान समझ कर उनसे नाम दीक्षा ले और अपना अनमोल जीवन सफल बनाएं संत रामपाल जी महाराज जी वह पुरानी गुरु जो हमें शास्त्रों के अनुसार भक्ति बताते हैं और मोक्ष की गारंटी देते हैं।

Wednesday, 10 June 2020

Holy Bible

पवित्र बाइबल

आइए आज हम एक ऐसे विषय के बारे में बात करते हैं जो हमारे मनुष्य जीवन में अहम योगदान रखता है वह है परमात्मा।परमात्मा के बारे में सब की अलग-अलग राय होती है कोई परमात्मा को निराकार बताता है कोई कहता है कि परमात्मा कभी दिखाई नहीं देते लेकिन फिर भी हम परमात्मा की भक्ति करने के लिए उत्सुक रहते हैं हम अलग अलग तरीके से परमात्मा को पाने का प्रयास करते हैं जिसने जैसा भी कहा हम वैसे ही परमात्मा को पाने का प्रयत्न करते हैं लेकिन हम सब कुछ करने के बाद भी असफल हो जाते हैं क्योंकि हम शास्त्र विधि के अनुसार भक्ति नहीं करते हैं इसलिए हमें जीवन में ना तो कोई सुख प्राप्त होता है और ना ही शांति मिलती है।

पवित्र बाइबल में सृष्टि रचना का प्रमाण:-

पवित्र बाइबल में हमें कई प्रमाण मिलते हैं जिससे साबित होता है कि परमात्मा साकार है मनुष्य दृश्य है उसमें 6 दिन में सृष्टि रची तथा साथ में दिन तत्पर जा बिराजा। कुरान शरीफ में पवित्र बाइबल का भी ज्ञान है इसलिए इन दोनों पवित्र सद ग्रंथों ने मिलजुल कर प्रमाणित किया है कि कौन तथा कैसा है सृष्टि रचना तथा उसका वास्तविक नाम क्या है।
पवित्र बाइबल (उत्पत्ति ग्रंथ प्रश्न नंबर 2 पर ,अ.1:20 -2:5पर)

प्राणी और मनुष्य: अन्य प्राणियों की रचना करके 26.फिर परमेश्वर ने कहा हम मनुष्य को अपने स्वरूप के अनुसार अपनी समानता में बनाएं जो सर्व प्राणियों को काबू रखेगा।
27.तब परमेश्वर ने मनुष्य को अपने स्वरूप के अनुसार उत्पन्न किया अपने ही स्वरुप के अनुसार परमेश्वर ने उसको उत्पन्न किया नर और नारी करके मनुष्य की सृष्टि की।
29.प्रभु ने मनुष्यों के खाने के लिए जितने बीच वाले छोटे पेड़ तथा जितने पेड़ों पर बीज वाले फल होते हैं वह भोजन के लिए प्रदान किए हैं मांस खाना नहीं कहा है।
ईसा मसीह ने दुनिया को प्रेम और अहिंसा का संदेश दिया ईसा मसीह को चाहने वाले ज्यादातर मांसाहारी क्यों बन गए क्या सच में अन्य जीवों की खुशियां छीन कर अपना पेट भरना यही मार्ग ईशा जी ने हमें दिखाया था?
सातवां दिन:-विश्राम का दिन:
परमेश्वर ने 6 दिन में सर्वश्रेष्ठ की उत्पत्ति की तथा साथ में दिन विश्राम किया ।
पवित्र बाइबल ने सिद्ध कर दिया कि परमात्मा मानव दृश्य शरीर में है जिसने 6 दिन में सर्वश्रेष्ठ की रचना की तथा फिर विश्राम किया।


जिस तरह जीसस ने सत्य के लिए संघर्ष किया जिसका परिणाम उनका घोर विरोध हुआ और उनको सूली पर चढ़ाया गया उसी प्रकार आज सतगुरु रामपाल जी महाराज की सत्य के लिए संघर्ष करते हुए जेल में है।
संत रामपाल जी महाराज ने हमें सभी संत ग्रंथों के बारे में पूर्ण जानकारी दी हमें बताया कि वह परमात्मा जिसकी हमें भक्ति करनी चाहिए वह कबीर देव है जिसका प्रमाण हमें हमारे सभी सब ग्रंथों में मिला है ।

रामपाल जी महाराज ही पूर्ण परमात्मा को पाने की सरल भक्ति विधि बताते हैं आप भी संत रामपाल जी महाराज का ज्ञान सुनकर तथा समझ कर उनसे नाम दीक्षा लेकर अपना मनुष्य जीवन सफल बनाएं।


Thursday, 4 June 2020

KabirPrakatDiwasNotJayanti


कबीर परमात्मा का प्रकट दिवस मनाते हैं, जयंती नहीं होती।


आज बताएंगे कि कबीर साहेब का जन्म दिवस नहीं होता, प्रकट दिवस होता है।



*सतगुरु रामपाल जी महाराज जी* प्रमाणित करके बताते हैं :-

🎆कबीर साहेब का प्रकट दिवस होता है, जयंती नहीं!
सन् 1398 (विक्रमी संवत् 1455) ज्येष्ठ मास शुद्धि पूर्णमासी को ब्रह्ममूहूर्त में अपने सत्यलोक से सशरीर आकर परमेश्वर कबीर बालक रूप बनाकर लहरतारा तालाब में कमल के फूल पर विराजमान हुए।
पूर्ण परमात्मा का माँ के गर्भ से जन्म नहीं होता।
🎆कबीर साहेब का जन्म नहीं होता!
आदरणीय गरीब दास जी ने भी अपनी वाणी के माध्यम से यह बताया है कि परमात्मा कबीर जी की कोई माता नही थी अर्थात उनका जन्म माँ के गर्भ से नही हुआ।
गरीब, अनंत कोटि ब्रह्मांड में, बंदीछोड़ कहाय। 
सो तो एक कबीर हैं, जननी जन्या न माय।।

🎆कबीर परमात्मा का प्रकट दिवस होता, जयंती नहीं!
पूर्ण परमात्मा कबीर जी का का जन्म कभी मां के गर्भ से नहीं होता। 
इसलिए उनका प्रकट दिवस मनाया जाता है 
कबीर जी अपने प्रकट होने के बारे में कहते है -
न मेरा जन्म न गर्भ बसेर, बालक बन दिखलाया।
काशी नगर जल कमल पर डेरा तहां जुलाहे ने पाया।।

🎆कबीर साहेब जयंती VS कबीर साहेब प्रकट दिवस
जयंती तो उसकी मनाई जाती है जिसकी जन्म- मृत्यु होती है, लेकिन "कबीर साहेब" अविनाशी भगवान हैं, जिनकी कभी भी जन्म-मृत्यु नहीं होती।

🎆कबीर साहेब जयंती VS कबीर साहेब प्रकट दिवस
कबीर साहेब ने अपनी वाणियों में स्पष्ट किया है, कि उनका जन्म नहीं होता।
ना मेरा जन्म न गर्भ बसेरा, बालक बन दिखलाया।
काशी नगर जल कमल पर डेरा, तहाँ जुलाहे ने पाया।
माता पिता मेरे कछु नाही, ना मेरे घर दासी।
जुलहे का सुत आन कहाया, जगत करे मेरी हांसी।।

🎆कबीर साहेब जयंती VS कबीर साहेब प्रकट दिवस
कबीर साहेब चारो युगों में प्रकट होकर पृथ्वी लोक पर आते हैं। उनका कभी माँ के गर्भ से जन्म नहीं होता। कमल के फूल पर प्रकट होते हैं। इसीलिए इसे जयंती नही प्रकट दिवस के रूप में मनाया जाता है।

🎆हिन्दू मुस्लिम के बीच में, मेरा नाम कबीर।
आत्म उद्धार कारणे, अविगत धरा शरीर।।
कबीर साहेब ने इस वाणी में कहा है कि लोगो का आत्म उद्धार करने के लिए परमात्मा इस पृथ्वी पर प्रकट होते हैं।

🎆सभी देवों का जन्म दिवस तो आखिर कबीर जी का प्रकट दिवस क्यों ?
पूर्ण परमात्मा कबीर जी के अलावा सभी देव जन्म-मृत्यु में हैं और प्रकट दिवस सिर्फ अविनाशी परमात्मा का ही मनाया जाता है क्योंकि वह जन्म नहीं लेते बल्कि हर युग में कमल के फूल पर प्रकट होते हैं।

🎆सिर्फ कबीर जी का ही प्रकट दिवस क्यों ?*
   ऋग्वेद मंडल नंबर 9 सूक्त 1 मंत्र 9 में प्रमाण है कि वह परमात्मा सतलोक से शिशु रूप धारण करके प्रकट होता है और कुंवारी गायों के दूध से उसकी परवरिश होती है ।
ऋग्वेद  मंडल नंबर 9 सूक्त 96 मंत्र 17 में भी वर्णन है कि पूर्ण परमात्मा कबीर जी जान बूझकर बालक रूप में प्रकट होते है।
इसलिए उनका प्रकट दिवस मनाया जाता है ।
🎆जिनका अवतरण होता है उनका जन्म दिवस नहीं होता।
कबीर परमात्मा हर युग में शिशु रूप में कमल के फूल पर अवतरित होते हैं, इसलिए उनका प्रकट दिवस मनाया जाता है

🎆चारों युगों में सिर्फ कबीर परमात्मा के प्रकट होने के ही प्रमाण हैं
सतयुग में सत सुकृत नाम से,
त्रेता में मुनीन्द्र नाम से, 
द्वापर में करुणामय नाम से,
और कलयुग में अपने असली नाम कबीर नाम से प्रकट होते हैं।
बाकी सभी देव मां के गर्भ से जन्म लेते हैं।
🎆कबीर जयंती और कबीर प्रकट दिवस में अंतर
जो जन्मता है उसकी जयंती मनाई जाती है, जो अजन्मा है, स्वयंभू है, वह प्रकट होता है। कबीर साहेब, अमर पुरूष लीला करते हुए बालक रूप धारण करके स्वयं प्रकट होते हैं।

इन पंक्तियों में कबीर साहेब जी की महिमा का गुणगान किया गया।

*गरीब, भक्ति मुक्ति ले उतरे, मेटन तीनूं ताप।*
*मोमन के डेरा लिया, कहै कबीरा बाप।।*

Note:-
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Mahashivratri kab h

शिवरात्रि का व्रत Mahashivratri जैसे ही शिवरात्रि नजदीक आती है हर शिवभक्त के मन मे भक्ति भाव की लहर दौड़ पड़ती है। कोई पूछता है कि शिव...