Wednesday, 8 July 2020

Mahashivratri kab h

शिवरात्रि का व्रत

Mahashivratri
Mahashivratri
जैसे ही शिवरात्रि नजदीक आती है हर शिवभक्त के मन मे भक्ति भाव की लहर दौड़ पड़ती है। कोई पूछता है कि शिवरात्रि कब है?शिवरात्रि हिंदुओं के लिए एक उत्सव का दिन होता है, इसमें रात भर शिवभक्त भगवान शिव की भक्ति में लीन रहते हैं।मनोकामना पूर्ति हेतु हमेशा से चली आ रही भक्ति विधि से भगवान शिव की भक्ति करते हैं। शिवलिंग की पूजा का यह पर्व पूरे भारत में लगभग सभी जगह मनाया जाता है जिसमें विशेष सामग्री जैसे दूध, बेलपत्र, फूल, फल आदि, शिव अभिषेक करके शिव लिंग पर चढ़ाया जाता है। भगवान शिव को इष्ट देव के रूप में मानने वाली भक्त आत्माएं इस उत्सव या व्रत को बड़े धूमधाम से मनाते हैं।
शिवरात्रि (Shivratri) क्या है?

शिवरात्रि ( Shivratri) को हिंदू धर्म में एक उत्सव की तरह मनाया जाता है। इसे माता पार्वती और भगवान शिव के भक्तों के लिए पर्व का उत्सव भी कहते हैं। इस दिन भगवान शिव को आराध्य मानने वाले भक्तों में उमंग रहती है। वे अपने अनुसार भगवान शिव की भक्ति करते हैं तथा उनको खुश करने के लिए उनके शिवलिंग की पूजा आराधना करते हैं। इसी दिन की रात में भगवान शिव को रातभर जगाने के लिए देवताओं ने एक उत्सव का आयोजन किया था। जिससे खुश होकर भगवान शिव ने देवताओ को शुभ आशीर्वाद दिया तभी से यह रात शिवरात्रि के नाम से प्रचलित है। जिसे महाशिवरात्रि के नाम से जाना जाता है।

शिवरात्रि (Shivratri) क्यों मनाई जाती है?

समुद्र मंथन, अमर अमृत का उत्पादन करने के लिए निश्चित था, लेकिन इसके साथ ही हलाहल नामक विष भी पैदा हुआ था। हलाहल विष में पूरे संसार को नष्ट करने की क्षमता थी और इसलिए केवल भगवान शिव इसे नष्ट कर सकते थे। भगवान शिव ने हलाहल नामक विष को अपने कंठ में रख लिया था। जहर इतना ज्वलनशील था कि भगवान शिव दर्द से पीड़ित थे और उनके गले का रंग नीला हो गया था। इस कारण से भगवान शिव ‘नीलकंठ‘ के नाम से प्रसिद्ध हुए।

उपचार के लिए, चिकित्सकों मुनियों ने देवताओं को भगवान शिव को रात भर जागते रहने की सलाह दी। इस प्रकार, देवतागण ने भगवान शिव के चिंतन में एक प्रयोजन रखा तथा भगवान शिव का ध्यान हटाने और रातभर जगाने के लिए उन्होंने अलग-अलग नृत्य और संगीत बजाए। जैसे ही सुबह हुई, उनकी भक्ति से प्रसन्न भगवान शिव ने उन सभी को आशीर्वाद दिया। शिवरात्रि इस घटना का उत्सव है, जिससे शिव ने दुनिया को बचाया। तब से इस दिन, भक्त उपवास करते है।
शिवरात्रि का व्रत:-
Shivratri एक अनोखा उत्सव है जिसमें लगभग सभी हिन्दू धर्म के व्यक्ति भाग लेते हैं। अपनी मनोकामना पूर्ति के लिए सब इस व्रत को करते हैं। इस व्रत को अलग-अलग स्थानों पर अलग-अलग विधि से मनाया जाता है जिनमें से एक विधि नीचे बताई गई है। इस दिन व्रत करने वाले व्यक्ति सुबह से लेकर अगली सुबह तक किसी प्रकार के आहार का सेवन नहीं करते। भगवान शिव की कथा सुनते हैं। भगवान शिव के शिवलिंग पर कच्चा दूध,बेलपत्र,फुल,फल आदि चढ़ाकर अपना व्रत पूरा करते है। जिससे उनको क्षणिक लाभ मिल जाते हैं।

भगवान से पूर्ण लाभ लेने के लिए हमें अपने शास्त्र के अनुसार भक्ति करनी होगी जिससे हमें जीवन पर्यंत मिलने वाले लाभ प्राप्त हो सकते है। शिवरात्रि के व्रत को करने से मिलने वाले लाभ का क्षणिक होने का कारण यह है कि यह हमारे शास्त्रों में जो भक्ति विधि लिखी है उनके विरुद्ध है।
Mahashivratri
Mahashivratri

हमारे शास्त्रों में लिखा है कि हमें किसी भी प्रकार के व्रत नहीं करना चाहिए। गीता अध्याय 16 श्लोक 23 में लिखा है कि जो व्यक्ति शास्त्रोंविधि को छोड़ कर मनमानी पूजा करते हैं उनको मोक्ष प्राप्त नहीं होता है.

गीता अध्याय 6 श्लोक 16 मैं लिखा है कि योग व भक्ति विधि ना तो बहुत अधिक खाने वाले की और ना ही बिलकुल ना खाने वाले की अर्थात उपवास व्रत करने की सिद्ध हो सकती है अर्थात व्रत करना सख्त मना है। फिर भी हम व्रत करते हैं जिसे हमें केवल क्षणिक लाभ मिलता है। इससे न तो हमारा मोक्ष होता है और न ही हमें जीवन पर्यंत लाभ मिलता है।

इस शिवरात्रि पर अवश्य जानिए की आखिर पूर्ण परमात्मा कौन है? 
आप को बता दें की अनंत ब्रह्मांडो के रचनाहार कबीर साहेब जी यानी कविर देव जी है। ये सभी आत्माओं के पिता है। इन्होंने ही 21 ब्रह्मांडो सहित असंख्य ब्रह्मांडो की रचना की है। ये हमें हमारे असली घर सतलोक का ज्ञान कराने के लिए समय समय पर या तो खुद यहां आते है या फिर अपने संत को काल के लोक में भेजते है. आज वर्तमान में संत रामपाल जी महाराज ही पूर्ण संत है। संत रामपाल जी महाराज की दया से ही हम वापस हमारे असली घर, शाश्वत स्थान सतलोक जा सकते है। अधिक जानकारी के लिए जरूर देखें साधना चैनल रोज शाम 7:30 से 8:30.



Wednesday, 1 July 2020

Raksha Bandhan fastival

Raksha Bandhan



राखी पर्व की मान्यता


भारत की सांस्कृतिक छटा ही निराली है। यहां के लोगों को हर प्रकार के त्यौहार मनाने में खुशी मिलती है। बहन द्वारा भाई की कलाई पर राखी बांधने की प्रथा अत्यंत पुरानी है। इस दिन बहन अपने भाई के मस्तक पर टीका लगाकर, कलाई पर राखी बांधकर उसकी दीर्घायु की कामना करती है। और भाई से अपनी सुरक्षा की उम्मीद। 

राखी आज भले ही पर्व के रूप में मनाया जाता है परंतु आपको यह जानकर आश्चर्य होगा की यह कोई पर्व नहीं है असल में रक्षाबंधन की परंपरा उन बहनों ने शुरू की थी जो सगी नहीं थीं।

आइए जानते हैं कैसे आरंभ हुई राखी मनाने की परम्परा
रक्षाबंधन सुनी सुनाई बातों पर आधारित त्योहार 

रक्षाबंधन की शुरुआत का सबसे पहला साक्ष्य रानी कर्णावती व सम्राट हुमायूँ को माना जाता है। जहां मध्यकालीन युग में राजपूत व मुस्लिमों के बीच संघर्ष चल रहा था। रानी कर्णावती चितौड़ के राजा की विधवा थीं। उस दौरान गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह से अपनी और अपनी प्रजा की सुरक्षा का कोई रास्ता न निकलता देख रानी ने हुमायूँ को राखी भेजी थी। तब हुमायूँ ने उनकी रक्षा कर उन्हें बहन का दर्जा दिया था। यहां तो हिंदू महारानी ने मुस्लिम राजा को धागा भेज अपने राज्य की रक्षा हेतु ऐसा किया था। इसे देखते हुए तो हमें सीख लेनी चाहिए कि हम हिंदू मुस्लिम एक-दूसरे के दुश्मन नहीं भाई बहन हैं। भले ही उस बहन ने अपने संरक्षण के लिए ऐसा किया था लेकिन उसी के कारण रक्षाबंधन एक पर्व के रूप में मनाया जा रहा है।

परमात्मा स्वयं करते हैं रक्षा
सूक्ष्म वेद के अनुसार द्रोपदी ने अपनी साड़ी को टुकड़ों में फाड़ कर घाट पर स्नान करने आए नेत्रहीन साधु (कबीर साहेब बनकर आए थे) की लाज बचाई थी। साधु ने आशीर्वाद दिया था जैसे आज तूने मेरी लाज रखी है परमात्मा तेरी लाज रखेगा।
द्वापर युग में जब कृष्ण भगवान ने दुष्ट राजा शिशुपाल को मारा था। युद्ध के दौरान कृष्ण के बाएँ हाथ की अँगुली से खून बह रहा था। इसे देखकर द्रोपदी बेहद दुखी हुईं और उन्होंने अपनी साड़ी का टुकड़ा चीरकर कृष्ण की अँगुली में बाँधा जिससे उनका खून बहना बंद हो गया। तभी से कृष्ण ने द्रोपदी को अपनी बहन स्वीकार कर लिया था। वर्षों बाद जब पांडव द्रोपदी को जुए में हार गए थे और भरी सभा में दुशासन उनका चीरहरण परिवार के बडे़ बूढों, चाचा, ताऊ, पांच पतियों की उपस्थिति में करना चाह रहा था तब द्रौपदी की रक्षा पूर्ण ब्रह्म कबीर साहेब जी ने अपने वचनानुसार कृष्ण जी के रूप में आकर की थी। पूरा श्रेय कृष्ण जी को मिला।
Raksha Bandhan
Raksha Bandhan

प्रत्येक युग गवाह है कि औरत को देवी का दर्जा देने वाले समय में भी औरत की सुरक्षा चिंता का विषय थी। तब भी उनकी रक्षा करने वाले परमात्मा स्वयं करते थे।
सर्व विदित है रावण ने अपनी बहन श्रुरूपनखा की कटी नाक का बदला राम और लक्ष्मण से लेने की ठानी तो रावण का क्या हाल हुआ। उसे अपनी जान तक गंवानी पड़ी। अपनी बहन की कटी नाक का किसी भी तरह से बदला लेने के लिए कुबुद्धि रावण ने राम जी की पत्नी सीता जी का हरण कर लिया था। जो भगवान विष्णु की पत्नी श्री लक्ष्मी जी का अवतार थीं और रावण शिवजी जी का कट्टर भक्त था फिर भी शिवजी के बड़े भाई की पत्नी को उठा ले गया था निर्लज्ज। अंत समय में स्वयं कबीर परमेश्वर ने अदृश्य रूप में रावण को मार गिराया और श्रेय राम जी को मिला।

मीरा के विवाह के बाद उसके पति की कुछ ही समय पश्चात मृत्यु हो गई थी। उसके देवर ने उसे तरह तरह के तंज दिए, मारना चाहा। विष तक पिला दिया था। कोई भाई उसके बचाव को नहीं आया था। केवल पूर्ण परमात्मा ने ही पल पल मीरा की रक्षा की। क्योंकि अंत में मीरा ने पूर्ण परमात्मा कबीर साहेब जी को अपना गुरु बनाया था।

आज के संदर्भ में राखी का नैतिक मूल्य व भाव दोनों बदल गए हैं।
प्रत्येक वर्ष लाखों बहनें दहेज के लालच में मार डाली जाती हैं। बलात्कार और ऐसिड अटैक की शिकार बनाई जाती हैं। क्या वह किसी की बहन नहीं होती?
निर्भया से लेकर जम्मू के कठुआ गैंग रैप की शिकार हुई बहन बेटियों ने न केवल अपनी इज्जत खोई बल्कि बलात्कार करने के बाद बलात्कारियों ने बेरहमी से उनका कत्ल भी किया। औरत बहन, बेटी, मां के रूप में कहीं भी सुरक्षित नहीं है। भाई सरीखे दिखने वाले ही चीर रहे हैं बहन की आबरू को। सरेआम लूटा जा रहा है उसके जिस्म को।
अनाथालयों में हज़ारों बच्चियों के साथ वहीं के संचालक दुष्कर्म करते हैं कोई भी भाई उनकी रक्षा करने नहीं आता। ऐसा प्रतीत होता है आज के समय की राखी केवल सगी बहन की रक्षा तक सीमट गई है। वह भी सगे भाई करने में असमर्थ हैं क्योंकि कभी भाई की मृत्यु पहले हो जाती है तो कभी किसी कारण से बहन की।

आइए जानते हैं कलयुग में कैसा है रक्षाबंधन का प्रारूप
❇कुछ समय पहले तक दूसरे की बहन को अपनी बहन समझने का भाव स्वत: ही मन में आ जाता था। परंतु अब समय ने भावनाओं, विचारों और मूल्यों की ऐसी पलटी खाई है कि अब समाज केवल अपने अपने रिश्तों तक सीमित हो गया है। अब दूसरे की बहन को हवस की नज़र से देखा जाता है। जहां लड़की अकेली देखी वहीं उसकी अस्मत पर हमला कर दिया जाता है। समाज में भाईचारा नहीं बलात्कार जैसी हैवानियत का राज चल रहा है।

❇आज रक्षाबंधन का प्रारूप बिल्कुल बदल गया है। इसमें समय के साथ साथ बाहरी आडंबर जुड़ते जा रहे हैं जिनमें बड़ा योगदान पंडितों का भी रहा है यह त्योहार उनकी जीविका का साधन है। राखी के दिन का समय/मुहूर्त पंडित निकालते हैं। बाज़ार रंग-बिरंगी राखियों से सज जाते हैं। बहनें पूरा हारश्रृंगार करती हैं। इसमें आधुनिकता तो आ गई है परंतु आध्यात्मिकता नदारद है। रक्षाबंधन का पर्व अब नकली प्रतीत होता है। मनुष्य यह भूल गया है की रक्षा तो केवल सर्वसृष्टि रचनहार परमात्मा ही कर सकता है क्योंकि उसी न बहन बनाई और भाई बनाया। हम पृथ्वी पर किसी और के सहारे जीवित नहीं हैं। केवल संस्कार वश बंधे हैं।

सभी त्योहार मानव द्वारा शुरू किए गए हैं इन्हें मनाने के आदेश और निर्देश परमात्मा के नहीं हैं।
अब राखी बांधने और बंधवाने वालों के पास इस पर्व को मनाने का समय नहीं रहा है। भाई बहन अलग-अलग देशों में रहते हैं तो रक्षा करना व कराना दोनों व्यर्थ लगता है।
शुरूआत में उसका उद्देश्य केवल परपुरुष से राज्य व जीवन की रक्षा थी, या पत्नी द्वारा युद्ध के समय अपने पति की विजय कामना। अब यह केवल मनोरंजक त्योहार बन कर रह गया है। देश के राष्ट्रपति व प्रधानमंत्री स्कूली बच्चियों से रक्षाबंधन का सूत्र बंधवा कर भाईचारे व बेटियों के उज्ज्वल भविष्य की कामना का पैगाम देते हैं। परंतु सच तो यह है कि बहनों की सुरक्षा की जिम्मेदारी यहां राष्ट्रपति से लेकर प्रधानमंत्री तक कोई भी व्यक्ति कर सकने में सक्षम नही है। रक्षा तो केवल परमात्मा ही कर सकता है और वही एक है जो करता है। जिसने मां के गर्भ में भी हमारा पालन-पोषण किया। जीवन और मृत्यु दोनों परमात्मा के हाथ में हैं। इतिहास गवाह है रक्षा तो केवल परमात्मा या परमात्मा का भेजा सदगुरू तत्वदर्शी संत ही कर सकते हैं और करते भी हैं। पूर्ण सन्त उसी व्यक्ति को शिष्य बनाता है जो सदाचारी रहे। तत्वदर्शी संत का शिष्य सामाजिक बुराईयों से सदा दूर रहता है दूसरे की बहन मां, बेटी को अपनी बहन बेटी के समान देखता है। कबीर परमात्मा कहते है :-

पर नारी को देखिए, बहन बेटी के भाव ।
कहे कबीर काम नाश का, यही सहज उपाय ।।

दूसरे की स्त्री को अपनी बहन, बेटी के भाव से देखें, जिससे पर स्त्री को देखकर उठने वाली काम वासना स्वत: नष्ट हो जाती है।
जब-जब धर्म की हानि होती है व अधर्म की वृद्धि होती है तथा वर्तमान के नकली संत, महंत व गुरुओं द्वारा भक्ति मार्ग के स्वरूप को बिगाड़ दिया गया होता है। फिर परमेश्वर स्वयं आकर या अपने परमज्ञानी संत को भेज कर सच्चे ज्ञान के द्वारा धर्म की पुनः स्थापना करता है। इस समय पृथ्वी पर मौजूद एकमात्र “तत्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज” जी हैं जो अपने सतज्ञान के द्वारा अपने शिष्यों को बुराइयों से बचने की शिक्षा देते हैं। सभी भाईयों को चाहिए अपनी बहन को तत्वदर्शी संत से नाम दीक्षा दिलवाए। यदि बहन को पहले तत्वज्ञान समझ आ गया है तो भाई को सदगुरु देव जी से नाम दीक्षा दिलवाए।
Raksha Bandhan
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हमें अपने आस पास हो रही घटनाओं से सबक लेते हुए यह समझना होगा की यह स्थान जहां हम रह रहे हैं यह मृतलोक है यहां कुछ स्थाई नहीं है। यह स्थान रहने लायक नहीं है। हम झूठे क्षणिक सुखों में खुशियां ढूंढते रहते हैं।

झूठे सुख को सुख कहे, मानत है मन मोद
खलक चबैना काल का, कुछ मुंह में कुछ गोद।।

कबीर जी समझाते हैं कि अरे जीव ! तू झूठे सुख को सुख कहता है और मन में प्रसन्न होता है? देख यह सारा संसार मृत्यु के लिए उस भोजन के समान है, जो कुछ तो काल के मुंह में है और कुछ गोद में खाने के लिए रखा है।

पंचमुखी ब्रह्मा जी ने अपनी ही बेटी को बदनियत से आलिंगन किया जिस कारण शिव के कहने पर उनको शरीर छोड़ना पड़ा और फिर विष्णु जी की नाभि से दोबारा जन्म लेना पड़ा। जहां पृथ्वी से लेकर स्वर्ग लोक तक स्त्री किसी भी रूप में सुरक्षित नहीं वहां रक्षाबंधन का त्यौहार केवल नाम का लगता है।

कबीर, लूट सकै तो लूटिले, राम नाम है लूटि।
पीछै फिरि पछिताहुगे, प्राण जाँयगे छूटि।।

इस समय परमात्मा धरती पर हम जीवों की रक्षा और उद्धार करने स्वयं सतलोक से आए हैं। जो परमात्मा को पहचान कर उनकी शरण में आ जाएगा उसका बाल भी बांका नहीं होगा। बहन, भाई, माता पिता, बेटी सभी को परमात्मा कबीर जी की शरण में लाओ और हर बंधन से छुटकारा तो मिलेगा और रक्षा भी सर्व सृष्टि रचनहार करेगा। यदि जीवन में सुरक्षा चाहिए तो असली बंधन परमात्मा से ही बनाना होगा।
संत रामपाल जी महाराज परमेश्वर कबीर जी के आध्यात्मिक ज्ञान को जनजन तक पहुँचा रहे हैं। ताकि मानव जाति विकार रहित होकर परमात्मा की भक्ति करे। संत रामपाल जी महाराज जी के विचारों को सुनकर लाखों व्यक्ति सर्व बुराई त्यागकर सत भक्ति करते हुए परमात्मा पर आश्रित हो चुके हैं। क्योंकि राम, शिव, ब्रह्मा, विष्णु कोई भी किसी बहन की सहायता और रक्षा करने में सक्षम नहीं हैं। ये भी परम शक्ति पर निर्भर हैं। रक्षा प्रत्येक की हो सकती है जो पूर्णतया परमात्मा पर आश्रित होकर सतभक्ति करेगा।
Raksha Bandhan
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जिसके हाथ में जन्म मृत्यु की डोर है, बंधन उसी से जोडो, रक्षा स्वयं करेगा।

Mahashivratri kab h

शिवरात्रि का व्रत Mahashivratri जैसे ही शिवरात्रि नजदीक आती है हर शिवभक्त के मन मे भक्ति भाव की लहर दौड़ पड़ती है। कोई पूछता है कि शिव...