Sunday, 31 May 2020

Miracles_Of_GodKabir

            कबीरपरमेश्वर_के_चमत्कार                               



💥"सिकंदर लोधी बादशाह के जलन का असाध्य रोग ठीक करना"
कबीर परमेश्वर जी ने दिल्ली के बादशाह सिकंदर लोधी के जलन का असाध्य रोग आशीर्वाद मात्र से ठीक कर दिया। वह रोग जो किसी काजी, मुल्ला के जंत्र-मंत्र से भी ठीक नहीं हुआ था।

💥"स्वामी रामानंद जी को जीवित करना"
दिल्ली के बादशाह सिकंदर लोधी ने स्वामी रामानंद जी की गर्दन तलवार से काट दी थी। कबीर साहेब जी ने देखा कि रामानंद जी का धड़ कहीं और सिर कहीं पर पड़ा था। तब कबीर साहेब ने मृत शरीर को प्रणाम किया और कहा कि गुरुदेव उठो। दूसरी बार कहते ही सिर अपने आप उठकर धड़ पर लग गया और रामानंद जी जीवित हो गए।

💥"मृत लड़के कमाल को जीवित करना"
शेखतकी का कहना था कि अगर कबीर अल्लाह है, तो किसी मुर्दे को जीवित कर दे तो अल्लाह मान लूंगा। सुबह एक 10-12 वर्ष की आयु के लड़के का शव पानी में तैरता हुआ आ रहा था। शेखतकी ने जंत्र-मंत्र से प्रयत्न किया लेकिन लड़का जीवित नहीं हुआ। तब कबीर साहेब ने कहा कि हे जीवात्मा जहाँ भी है, कबीर हुक्म से मुर्दे में प्रवेश कर और बाहर आ। इतना कहा ही था कि शव में कम्पन हुई तथा जीवित होकर बाहर आ गया।

💥"भैंसे से वेद मन्त्र बुलवाना"
एक समय तोताद्रि नामक स्थान पर सत्संग था। सत्संग के पश्चात भण्डारा शुरू हुआ। भंडारे में भोजन करने वाले व्यक्ति को वेद के चार मन्त्र बोलने पर प्रवेश मिल रहा था। कबीर साहेब की बारी आई तब थोड़ी सी दूरी पर घास चरते हुए भैंसे को हुर्रर हुर्रर करते हुए बुलाया। तब कबीर जी ने भैंसे की कमर पर थपकी लगाई और कहा कि भैंसे इन पंडितों को वेद के चार मन्त्र सुना दे। भैंसे ने छः मन्त्र सुना दिए।

💥"जगन्नाथ के पांडे की कबीर जी द्वारा रक्षा"
जगन्नाथ पुरी में एक रामसहाय पाण्डा खिचड़ी का प्रसाद उतार रहा था। गर्म खिचड़ी उसके पैर पर गिर गई। उस समय कबीर जी अपने करमण्डल से हिम जल रामसहाय पाण्डा के पैर पर डाला। उसके तुरंत बाद राहत मिलते ही पैर ठीक हो गया। उस समय कबीर जी ना होते रामसहाय पाण्डा का पैर जल जाता।
गरीबदास जी देते हैं -
पग ऊपरि जल डालकर, हो गये खड़े कबीर। गरीबदास पंडा जरया, तहां परया योह नीर।।
जगन्नाथ जगदीश का, जरत बुझाया पंड। गरीबदास हर हर करत, मिट्या कलप सब दंड।।

💥"गोरखनाथ से गोष्ठी"
एक बार कबीर परमेश्वर जी और गोरखनाथ जी की गोष्ठी हुई। गोरखनाथ जी गंगा नदी की ओर चल पड़ा। उसमें जा कर छलांग लगाते हुए कबीर जी से कहा कि मुझे ढूंढ दो मैं आपका शिष्य बन जाऊँगा। गोरखनाथ मछली बन कर गए। कबीर साहेब ने उसी मछली को पानी से बाहर निकाल कर सबके सामने गोरखनाथ बना दिया। तब गोरखनाथ कबीर जी के शिष्य बने।

💥"मृत गऊ को जीवित करना"
सिकंदर लोधी ने एक गऊ के तलवार से दो टुकड़े कर दिये। गऊ को गर्भ था और बच्चे के भी दो टुकड़े हो गए।
तब सिकंदर लोधी राजा ने कहा कि कबीर, यदि तू खुदा है तो इस गऊ को जीवित कर दे अन्यथा तेरा सिर भी कलम कर (काट) दिया जाएगा। साहेब कबीर ने एक बार हाथ गऊ के दोनों टुकड़ों को लगाया तथा दूसरी बार उसके बच्चे के टुकड़ों को लगाया। उसी समय दोनों माँ-बेटा जीवित हो गए। साहेब कबीर ने गऊ से दूध निकाल कर बहुत बड़ी देग (बाल्टी) भर दी
तथा कहा -
गऊ अपनी अम्मा है, इस पर छुरी न बाह।
गरीबदास घी दूध को, सब ही आत्म खाय।।
चुटकी तारी थाप दे, गऊ जिवाई बेगि।
गरीबदास दूझन लगी, दूध भरी है देग।।

💥"सेउ की कटी हुई गर्दन को जोड़ना"
परमात्मा कबीर ने अपने भक्त की कटी हुई गर्दन वापिस जोड़ दी थी।
 आओ सेउ जीम लो,यह प्रसाद प्रेम।
 सिर कटते हैं चोरों के,साधों के नित्य क्षेम।।
 ऐसी-2 बहुत लीलाएँ साहेब कबीर (कविरग्नि) ने की हैं जिनसे यह स्वसिद्ध है कि ये ही पूर्ण परमात्मा हैं। सामवेद संख्या नं. 822 तथा ऋग्वेद मण्डल 10 सूक्त 162 मंत्र 2 में कहा है कि कविर्देव अपने विधिवत् साधक साथी की आयु बढ़ा देता है।

💥"काशी का अद्भुत भंडारा"
 शेखतकी मुस्लिम पीर ने कबीर साहेब को नीचा दिखाने के लिए 3 दिन के भंडारे की कबीर साहेब के नाम से सभी जगह झूठी चिठ्ठी डलवाई थी कि कबीर जी तीन दिन का भंडारा करेंगे, सभी आना। भोजन के बाद एक मोहर, एक दोहर भी देंगे। कबीर साहेब ने तीन दिन का मोहन भंडारा कराया और लाखों की संख्या में उनके अनुयायी हुए।

💥"मृत लड़की को जीवित करना"
शेखतकी ने कबीर साहेब को कहा कि अगर आप अल्लाह हो तो मेरी इस मृत लड़की को जीवित कर दो तब कबीर साहेब ने शेखतकी की मृत लड़की को जीवित कर किया था और उस लड़की का नाम कमाली रख दिया था।

💥नामदेव जी की छान डालना
जब जर्जर हुई झोपड़ी की छत को सही करने में लिए माता ने नामदेव को घास फूस लाने भेजा, तो रास्ते में सत्संग सुनने की वजह से और कुल्हाड़ी लगने से जब नामदेव घास फूस की व्यवस्था नहीं कर पाया और खाली हाथ घर लौटा तो नामदेव के रूप में कबीर जी झोपड़ी की छत डाल गए।

💥‘‘शिशु कबीर परमेश्वर का नामांकन"
जब कबीर साहेब का नाम रखने के लिए कुरान शरीफ पुस्तक को काज़ी ने खोला। प्रथम नाम ‘‘कबीरन्’’ लिखा था। काजियों ने सोचा इस छोटे जाति वाले का कबीर नाम रखना शोभा नहीं देगा। पुनः कुरान शरीफ खोली तो उसमें सर्व अक्षर कबीर-कबीर-कबीर-कबीर हो गए। कबीर परमेश्वर शिशु रूप में बोले मैं कबीर अल्लाह अर्थात् अल्लाहु अकबर, हूँ। मेरा नाम ‘‘कबीर’’ ही रखो।
सकल कुरान कबीर है, हरफ लिखे जो लेख।
काशी के काजी कहै, गई दीन की टेक।।

💥"शिशु कबीर देव द्वारा कुँवारी गाय का दूध पीना’’
जब बालक कबीर को दूध पिलाने की कोशिश में नीरू नीमा असफल रहे। तब कबीर साहेब ने कहा कुँवारी गाय ले आओ मैं उसका दूध पीऊँगा। ऐसा ही हुआ।
ऋग्वेद मण्डल 9 सूक्त 1 मंत्र 9 में प्रमाण है कि पूर्ण परमात्मा अमर पुरुष जब लीला करता हुआ बालक रूप धारण करके स्वयं प्रकट होता है तब कुँवारी गाय अपने आप दूध देती है जिससे उस पूर्ण प्रभु की परवरिश होती है।

💥‘‘शिशु कबीर की सुन्नत करने का असफल प्रयत्न’’
शिशु रूपधारी कबीर देव की सुन्नत करने के लिए जब नाई कैंची लेकर गया तो परमेश्वर ने अपने लिंग के साथ एक लिंग और बना लिया। फिर उस सुन्नत करने को तैयार व्यक्ति की आँखों के सामने तीन लिंग और बढ़ते दिखाए कुल पाँच लिंग एक बालक के देखकर वह सुन्नत करने वाला आश्चर्य में पड़ गया।  शिशु को बोलते सुनकर तथा पाँच लिंग बालक के देख कर नाई ने अन्य उपस्थित व्यक्तियों को बुलाकर वह अद्धभुत दृश्य दिखाया। सर्व उपस्थित जन समूह यह देखकर अचम्भित हो गया।

💥‘‘कबीर जी द्वारा स्वामी रामानन्द के मन की बात बताना’’
 स्वामी रामानंद जी विष्णु जी की काल्पनिक मूर्ति बनाकर मानसिक पूजा करते थे। एक समय ठाकुर की मूर्ति पर माला डालनी भूल गए। तब कबीर परमात्मा जो कि 5 वर्ष के बालक की लीला कर रहे थे बोले कि माला की गांठ खोल कर गले में डाल दो स्वामी जी, पूजा खंडित नहीं होगी। तब रामानंद जी जो पर्दे के भीतर मन में पूजा कर रहे थे, कबीर परमात्मा को सबके सामने गले लगा लिया।
मन की पूजा तुम लखी मुकुट माल परवेश।
गरीबदास गति कौ लखै, कौन वरण क्या भेष।।

💥‘‘महर्षि सर्वानन्द की माँ शारदा का रोग ठीक करना"
एक सर्वानन्द नाम के महर्षि थे। उसकी आदरणीय माता श्रीमती शारदा देवी पाप कर्म फल से पीडि़त थी। उसने कबीर परमात्मा से उपदेश प्राप्त किया तथा उसी दिन कष्ट मुक्त हो गई।
क्योंकि पवित्र यजुर्वेद अध्याय 5 मंत्र 32
में लिखा है कि ‘‘कविरंघारिरसि‘‘ अर्थात् (कविर्) कबीर (अंघारि) पाप का शत्रु (असि) है। फिर इसी पवित्र यजुर्वेद अध्याय 8 मंत्र 13 में लिखा है कि परमात्मा (एनसः एनसः) अधर्म के अधर्म अर्थात् पापों के भी पाप घोर पाप को भी समाप्त कर देता है।

💥गोरखनाथ के साथ चमत्कार
एक बार गोरखनाथ जी जब कबीर परमेश्वर जी के साथ ज्ञान गोष्ठी कर रहे थे तो गोरखनाथ जी कबीर जी के सामने 5-6 फुट का त्रिशूल जमीन में गाड़कर उस पर बैठ गये और कहा कि यदि वार्ता करनी है तो मेरे साथ आकर बैठो।
कबीर जी ने एक धागे की रील आसमान में उछाली और 150 फुट की ऊंचाई पर धागे के अंतिम सिरे पर जाकर बैठ गए।
गोरखनाथ जी देखते रह गए।

💥मुर्दे को जीवित करना
ऋग्वेद मण्डल 10 सुक्त 161 मंत्र 2, 5, सुक्त 162 मंत्र 5, सुक्त 163 मंत्र 1 - 3 में प्रमाण मिलता है कि पूर्ण परमात्मा आयु बढ़ा सकता है और कोई भी रोग को नष्ट कर सकता है।
 उसी विधान अनुसार कबीर परमेश्वर ने कमाल, कमाली नाम के मुर्दों को जीवित किया था।
आज पूरे विश्व में एकमात्र संत रामपाल जी महाराज ही हैं जो शास्त्रों के अनुसार भक्ति बता रहे हैं 600 साल पहले कबीर साहिब जी ने शास्त्र अनुकूल भक्ति देकर हमें विभिन्न लाभ दिए वर्तमान में संत रामपाल जी महाराज वही लाभ अपने शिष्यों को दे रहे हैं आप भी संत रामपाल जी महाराज के सत्संग द्वारा उनका ज्ञान समझ कर उनसे दीक्षा प्राप्त करें और अपना जीवन सफल बनाएं
धन्यवाद 👏👏👏👏👏👏



52_Cruelities_On_GodKabir

कबीरपरमेश्वर_के_साथ_52बदमाशी

*सतगुरु रामपाल जी महाराज जी* प्रमाणित करके बताते हैं :-

♣️कबीर जी को मारने के लिए उन्हें खूनी हाथी के आगे बांध कर डाला गया।
लेकिन अविनाशी कबीर जी ने हाथी को शेर रूप दिखा दिया। जिससे हाथी भयभीत होकर भाग गया।
सबने कबीर जी की जय जयकार की।

♣️कबीर परमेश्वर को तोप के गोलों से मारने की व्यर्थ चेष्टा"
कबीर जी को मारने के लिए शेखतकी के आदेश पर पहले पत्थर मारे, फिर तीर मारे। परन्तु परमेश्वर की ओर पत्थर या तीर नहीं आया। फिर चार पहर तक तोप यंत्र से गोले चलाए गए।
लेकिन दुष्ट लोग अविनाशी कबीर जी का कुछ नहीं बिगाड़ सके।

♣️दिल्ली के सम्राट सिकंदर लोधी ने जनता को शांत करने के लिए अपने हाथों से हथकड़ियाँ लगाई, पैरों में बेड़ी तथा गले में लोहे की भारी बेल डाली आदेश दिया गंगा दरिया में डुबोकर मारने का। उनको दरिया में फैंक दिया। कबीर परमेश्वर जी की हथकड़ी, बेड़ी और लोहे की बेल अपने आप टूट गयी। परमात्मा जल पर सुखासन में बैठे रहे कुछ नहीं बिगड़ा।


♣️कबीर परमात्मा जब एक बार गंगा दरिया में डुबोने से भी नहीं डूबे तो शेखतकी ने फिर आदेश दिया कि पत्थर बाँधकर पुन: गंगा के मध्य ले जाकर जल में फैंक दो। सब पत्थर बँधन मुक्त होकर जल में डूब गए, परंतु परमेश्वर कबीर जी जल के ऊपर सुखासन लगाए बैठे रहे। नीचे से गंगा जल की लहरें बह रही थी। परमेश्वर आराम से जल के ऊपर बैठे थे।

♣️कबीर साहेब को मारने के लिए शेखतकी ने तलवार से वार करवाये। लेकिन तलवार कबीर साहेब के आर पार हो जाती क्योंकि कबीर साहेब का शरीर पाँच तत्व का नहीं बना था उनका नूरी शरीर था। फिर सभी लोगों ने कबीर साहेब की जय जयकार की।
साहेब कबीर को मारण चाल्या, शेखतकी जलील।
आर पार तलवार निकल ज्या, समझा नहीं खलील।।

♣️उबलते तेल में जलाने की चेष्टा
कबीर जी को जीवित जलाने के लिए उन्हें उबलते तेल के कड़ाहे में डाला गया। लेकिन समर्थ अविनाशी परमात्मा का  बाल भी बांका नहीं हुआ।

♣️"शेखतकी द्वारा कबीर साहेब को गहरे कुँए में डालना"
शेखतकी ने कबीर साहेब को बांध कर गहरे कुँए में डाल दिया, ऊपर से मिट्टी, ईंट और पत्थर से कुँए को पूरा भर दिया। फिर शेखतकी सिकन्दर राजा के पास गया वहां जाकर देखा तो कबीर परमेश्वर पहले से ही विराजमान थे।

♣️कबीर परमेश्वर को शेखतकी ने उबलते हुए तेल में बिठाया। लेकिन कबीर साहेब ऐसे बैठे थे जैसे कि तेल गर्म ही ना हो। सिकन्दर बादशाह ने तेल के परीक्षण के लिए अपनी उंगली डाली, तो उसकी उंगली जल गई। लेकिन अविनाशी कबीर परमेश्वर जी को कुछ भी नहीं हुआ।

♣️कबीर साहेब जब सत्संग कर रहे थे तब शेखतकी ने सिपाही से कहा कि इनके गले में जहरीला साँप डाल दो लेकिन वो साँप कबीर साहेब के गले में डालते ही सुंदर पुष्पों की माला बन गया। क्योंकि कबीर साहेब पूर्ण परमात्मा थे।

♣️कबीर साहेब सिकंदर लोधी के दरबार में बैठकर सत्संग कर रहे थे तब शेखतकी ने सिपाही से कहा कि लोहे को गर्म करके पिघलाकर पानी की तरह बनाओ और कबीर साहेब पर डालो। ठीक ऐसा ही हुआ जब लोहा गर्म करके पिघलाकर कबीर साहेब पर डाला तब वह फूल बन गए जैसे की मानो फूलों की वर्षा होने लगी। तब सभी ने कबीर साहेब की जय जयकार लगाई।

♣️परमात्मा के शरीर में कीले ठोकने का व्यर्थ प्रयत्न"
कबीर साहेब को मारने के लिए एक दिन शेखतकी ने सिपाहियों को आदेश दिया की कबीर साहेब को पेड़ से बांधकर शरीर पर बड़ी बड़ी कील ठोक दो। लेकिन जब कील ठोकने चले तो सिपाहियों के हाथ पैर काम करना बंद हो गए और वो वहाँ से भाग गए और शेखतकी को फिर परमात्मा कबीर साहेब के सामने लज्जित होना पड़ा।

♣️शेखतकी पीर ने कबीर साहेब को नीचा दिखाने के लिए 3 दिन के भंडारे की कबीर साहेब के नाम से सभी सभी आश्रमों में झूठी चिठ्ठी डलवाई थी कि कबीर जी 3 दिन का भंडारा करेंगे सभी आना भोजन के बाद एक मोहर, एक दोहर भी देंगे। कबीर साहेब ने 3 दिन का मोहन भंडारा भी करा दिया था और कबीर साहेब की महिमा भी हुई।

♣️"भूखा प्यासा मारने की चेष्टा"
एक दिन शेखतकी ने कबीर साहेब को नीम के पेड़ में लोहे के तार से बांधकर भूखा प्यासा छोड़ दिया और सोचा कि कबीर साहेब मर जाएंगे। लेकिन कबीर साहेब को कुछ नहीं हुआ और वो वापिस जीवित दरबार में पहुँच गए।
पानी से पैदा नहीं, स्वांसा नहीं शरीर।
अन्न आहार करता नहीं, ताका नाम कबीर।।

♣️"मुर्दे को जीवित करने की परीक्षा लेना"
दिल्ली के बादशाह सिकन्दर लोधी के पीर शेख तकी ने कहा कबीर जी को तब अल्लाह मानेंगे जब मेरी मरी हुई लड़की को जीवित कर देगा जो कब्र में दबी हुई है। कबीर परमेश्वर जी ने अपनी समर्थ शक्ति से हजारों लोगों के सामने उस लड़की को जीवित किया और उसका नाम कमाली रखा। कबीर परमेश्वर सर्वशक्तिमान हैं।

♣️"कबीर साहेब को जहरीले बिच्छू द्वारा मारने का प्रयास"
शेखतकी के आदेश पर सिपाही बहुत सारे बिच्छू टोकरी में भरकर सिकंदर लोधी राजा के दरबार में गए जहाँ कबीर साहेब सत्संग कर रहे थे फिर सिपाहियों ने कबीर साहेब पर बिच्छू छोड़ना शुरू कर दिया। लेकिन सभी बिच्छू कबीर साहेब तक पहुँचने से पहले ही विलीन हो गए।
यह देखकर सभी लोग हैरान हो गए और कबीर साहेब के जयकारे लगाने लगे

♣️"खूनी हाथी से मरवाने की व्यर्थ चेष्टा"
शेखतकी के कहने पर दिल्ली के बादशाह सिकंदर लोधी ने कबीर परमेश्वर को खूनी हाथी से मरवाने की आज्ञा दे दी। शेखतकी ने महावत से कहकर हाथी को एक-दो शीशी शराब की पिलाने को कहा।
हाथी मस्ती में भरकर कबीर परमेश्वर को मारने चला। कबीर जी के हाथ-पैर बाँधकर पृथ्वी पर डाल रखा था। जब हाथी परमेश्वर कबीर जी से दस कदम (50 फुट) दूर रह गया तो परमेश्वर कबीर के पास बब्बर शेर खड़ा केवल हाथी को दिखाई दिया। हाथी डर से चिल्लाकर (चिंघाड़ मारकर) भागने लगा। परमेश्वर के सब रस्से टूट गए। उनका तेजोमय विराट रूप सिकंदर लोधी को दिखा। तब बादशाह ने कांपते हुए अपने गुनाह की माफी मांगी।

♣️दिल्ली के बादशाह सिकन्दर लोधी के पीर शेखतकी ने कहा कि अगर यह कबीर अल्लाह है तो इसकी परीक्षा ली जाए कोई मुर्दा जीवित करे। तब सर्वशक्तिमान कबीर परमात्मा ने दरिया में बहते आ रहे एक लडके के‌ शव को हजारों लोगों के सामने जीवित किया। उसका नाम कमाल रखा। कबीर परमेश्वर समर्थ भगवान हैं। पूर्ण परमात्मा ही मृत व्यक्ति को जीवित कर सकता हैं।

♣️शेखतकी ने जुल्म गुजारे, बावन करी बदमाशी,
खूनी हाथी के आगे‌ डालै, बांध जूड अविनाशी,
हाथी डर से भाग जासी, दुनिया गुण गाती है।
शेखतकी ने अविनाशी को मारने के लिए खूनी हाथी के आगे डाला। हाथी कबीर भगवान के पास जाते ही डर कर भाग गया। तब लोगों ने कबीर साहेब की जय-जय कार की। कबीर भगवान अविनाशी है।

👆 इस तरह से 52 बार मारने का प्रयास किया गया था कबीर परमात्मा को, ये बताना है।

MagharLeela_Of_GodKabir


MagharLeela_Of_GodKabir


In maghar the blood thirsty Hindus and Muslims wept together after God's departure and collaborated with each other to create a memorial place that is revered for both Hindus and Muslims. Those interested in spirituality read the book
* Gyan Ganga *

Kabir Ji is the Eternal God.
Call him God or Ram or Rahim Kareem or Kabir
This is the divine, who lived in the home of a weaver in Kash and ascended back in his
 physically form from  Maghar, and then from time to time he come to meet their beloved souls and take them to Satlok and impart his true knowledge, that beloved soul of God is called a saint and lifelong God sings glory to the God.

The real God is Kabir ji, with each of his marvels  one realizes the power of God.
His descended from the Satlok on a lotus flower. And went along with his body from Magahar. Only a true God can do this

Dharmadas ji has spoken about God Kabir Sahib's Maghar spectacle in his writings
hindoo ke tum dev kahaaye, muslamaan ke peer..4..
donon deen ka jhagada chhid gaya, tohe na paaye shareer..

 At that time there was a deep religious divide between Hindus and Muslims who were ready to die fighting for the dead body of God Kabir.
When the divine went from Maghar to the Satlok along with his physical body and they found fragrant flowers in place of his body, seeing this divine miracle, all of them hugged and wept.

Even the great sages like Gorakhnath failed to get rain in the famine affected princely state of Maghar, but God Kabir had showered rain there in ten minutes and proved that he is the true father of us all.

When Kabir Sahebji went to Satlok (even above heaven) in his physical form, from Maghar, after that, both religions (Hindus and Muslims) took one coverlet and divided the fragrant flowers in half and built memorable a each at a difference of a hundred feet which still exists today


Maluk Das ji also certifies the proof of God Kabir going from to Satlok from Maghar in his physical form
kaashee taj guru magahar aae, donon deen ke peer,
koee gaadhe koee agn jaraave, dhoondha na paaya shareer .
chaar dhaag se sataguru nyaare, ajaro amar shareer,
 daas malook salook kahat hain, khojo khasam kabeer

Loka  mati ke bhora re।
Jo Kashi tab taje kabira, toh raamhe kaha nihora re।

 Parmeshwar Kabir ji says this is rumor that heaven is found by sacrificing the body in Kashi.  If I leave my body in Kashi, then what is the use of my true devotion?  I will leave my body in Maghar and go to Satlok with my devotion.

God Kabir went from Maghar in his physical form
dekhya maghar jahura ho, kaashee mein keerti kar chaale, jhilamil dehi noora ho .

Saint Garibdas Ji certifies in his writings regarding God Kabir's journey from Maghar to Satlok along with his body :
gareeb,kaaya kaashee man magahar,
dauhoon ke madhy kabeer,
kaashee taj magahar gaya,
paaya nahin shareer

Keenha Maghar Piyana ho, Doonon Deen Chale Sangi Jaake, Hindu Musalmaana ho।।
        Garib Das Ji Maharaj testified that when God Kabir went to perform Leela in Maghar, Hindus and Muslims went with him.

600 years ago, before leaving his body in Maghar, Kabir Sahib explained his knowledge to all the people, saying that Rama and Allah are one. People of all religions are children of one God.


 The great example of Hindu-Muslim unity in Magahar, from where Kabirji had left for Satlok along with his body, there are still lovely temples and mosques that exists at that  place.

To break the illusion of Hindu religious preachers that the one who dies in Magahar becomes a donkey in next life and the one who dies in Kashi goes to heaven, Kabir God, went to Satlok along with his body and in place of his body, fragrant flowers were found on the sheet
tahaan vahaan chaadari phool bichhaaye, sijya chhaandee padahi samaaye.
do chaadar dahoon deen uthaavain, taake madhy kabeer na paavain

When God Kabir expressed his desire to bathe in the flowing water as soon as he reached Maghar, Bijli Khan said that there is an Aami river here which has dried up due to the curse of Shiva. God Kabir reached the banks of the river and, with the gesture of a finger, water flowed into the river which had been dried up for years.

Kabir God had put an end to these evils by taking lakhs of Muslims in his refuge in the city of Maghar. Today, Sant Rampal ji is pursuing the same path and doing welfare of people of all religions.

The pundits of that time had spread the rumor that one who dies in Kashi goes to heaven and one who dies in Maghar goes to hell, so the Almighty departed from Maghar in his physical form to Satlok to break this illusion.

 Kabir God  went to Maghar with his physical body to  Satlok
And in place of his body fragrant flowers were found, which according to the command of God Kabir, the two religions divided into half and took. They built memorial with a difference of 100 feet from each other in Maghar, which is still present today.
This is an example of mutual harmony and unity between the two religions Hindus and Muslims.

 Pandits had spread the mistaken belief that one who dies in Kashi is liberated and death in Maghar makes one a donkey in next birth. But Kabir Saheb believed that if there is salvation in Kashi then what is the need to chant God's name and meditate throughout the life. Therefore Kabir Saheb reached Maghar from Kashi.
Kabir Sahib has also said in his writings
loka mati ke bhora re,jo kaashee tan tajai kabeera,tau raamahi kaun nihora re

Friday, 29 May 2020

GodKabir_Comes_In_4_Yugas

  कबीर परमात्मा चारों युगों में आते हैं

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यजुर्वेद के अध्याय नं. 29 के श्लोक नं. 25 (संत रामपाल जी महाराज द्वारा भाषा-भाष्य):-
जिस समय पूर्ण परमात्मा प्रकट होता है उस समय सर्व ऋषि व सन्त जन शास्त्र विधि त्याग कर मनमाना आचरण अर्थात् पूजा कर रहे होते हैं। तब अपने तत्वज्ञान का संदेशवाहक बन कर स्वयं ही कबीर प्रभु ही आता है।

🎉कबीर परमेश्वर चारों युगों में अपने सत्य ज्ञान का प्रचार करने आते हैं।
सतगुरु पुरुष कबीर हैं, चारों युग प्रवान।
झूठे गुरुवा मर गए, हो गए भूत मसान।।

🎉पूर्ण परमात्मा कविर्देव (कबीर परमेश्वर) वेदों के ज्ञान से भी पूर्व सतलोक में विद्यमान थे तथा अपना वास्तविक ज्ञान (तत्वज्ञान) देने के लिए चारों युगों में भी स्वयं प्रकट हुए हैं।

🎉सतयुग में सतसुकृत नाम से, त्रेतायुग में मुनिन्द्र नाम से, द्वापर युग में करूणामय नाम से तथा कलयुग में वास्तविक कविर्देव (कबीर प्रभु) नाम से प्रकट हुए हैं।

🎉कबीर परमात्मा अन्य रूप धारण करके कभी भी प्रकट होकर अपनी लीला करके अन्तर्ध्यान हो जाते हैं। उस समय लीला करने आए परमेश्वर को प्रभु चाहने वाले श्रद्धालु नहीं पहचान पाते, क्योंकि सर्व महर्षियों व संत कहलाने वालों ने प्रभु को निराकार बताया है। वास्तव में परमात्मा आकार में है। मनुष्य सदृश शरीर युक्त है।

🎉परमेश्वर का शरीर नाड़ियों के योग से बना पांच तत्व का नहीं है। एक नूर तत्व से बना है। पूर्ण परमात्मा जब चाहे यहाँ प्रकट हो जाते हैं वे कभी मां से जन्म नहीं लेते क्योंकि वे सर्व के उत्पत्ति करता हैं।

🎉सतयुग में कविर्देव (कबीर साहेब) का सत्सुकृत नाम से प्राकाट्य“
पूर्ण प्रभु कबीर जी (कविर्देव) सतयुग में सतसुकृत नाम से स्वयं प्रकट हुए थे। उस समय गरुड़ जी, श्री ब्रह्मा जी श्री विष्णु जी तथा श्री शिव जी आदि को सतज्ञान समझाया था।

🎉पूर्ण प्रभु कबीर जी (कविर्देव) सतयुग में सतसुकृत नाम से स्वयं प्रकट हुए थे।
श्री मनु महर्षि जी को भी तत्वज्ञान समझाना चाहा था। उन्होंने ज्ञान को सत न जानकर श्री ब्रह्मा जी के द्वारा निकाले वेदों के निष्कर्ष पर ही आरूढ़ रहे। इसके विपरीत परमेश्वर सतसुकृत जी का उपहास करने लगे और उनका उर्फ नाम वामदेव निकाल लिया।

🎉सतयुग में परमेश्वर कविर्देव जी जो सतसुकृत नाम से आए थे उस समय के ऋषियों व साधकों को वास्तविक ज्ञान समझाया करते थे। परन्तु ऋषियों ने स्वीकार नहीं किया। सतसुकृत जी के स्थान पर परमेश्वर को ‘‘वामदेव‘‘ कहने लगे।

🎉ऋग्वेद मण्डल 9 सूक्त 1 मंत्र 9
अभी इमं अध्न्या उत श्रीणन्ति धेनवः शिशुम्। सोममिन्द्राय पातवे।।9।।
पूर्ण परमात्मा अमर पुरुष जब लीला करता हुआ बालक रूप धारण करके स्वयं प्रकट होता है उस समय कंवारी गाय अपने आप दूध देती है जिससे उस पूर्ण प्रभु की परवरिश होती है।

🎉ऋग्वेद मण्डल 9 सूक्त 96 मंत्र 17
शिशुम् जज्ञानम् हर्य तम् मृजन्ति शुम्भन्ति वह्निमरूतः गणेन।
कविर्गीर्भि काव्येना कविर् सन्त् सोमः पवित्रम् अत्येति रेभन्।।
विलक्षण मनुष्य के बच्चे के रूप में प्रकट होकर पूर्ण परमात्मा कविर्देव अपने वास्तविक ज्ञानको अपनी कविर्गिभिः अर्थात् कबीर बाणी द्वारा पुण्यात्मा अनुयाइयों को कवि रूप में कविताओं, लोकोक्तियों के द्वारा वर्णन करता है। वह स्वयं सतपुरुष कबीर ही होता है।


🎉कबीर परमात्मा हर युग में आते हैं
ऋग्वेद मण्डल 9 सूक्त 96 मंत्र 18
कविर्देव शिशु रूप धारण कर लेता है। लीला करता हुआ बड़ा होता है। कविताओं द्वारा तत्वज्ञान वर्णन करने के कारण कवि की पदवी प्राप्त करता है अर्थात् उसे कवि कहने लग जाते हैं, वास्तव में वह पूर्ण परमात्मा कविर् (कबीर प्रभु) ही है।

🎉परमात्मा कबीर जी सतयुग में सत सुकृत नाम से प्रकट हुए थे। उस समय अपनी एक प्यारी आत्मा सहते जी को अपना शिष्य बनाया ओर अमृत ज्ञान समझाकर सतलोक का वासी बनाया।

🎉त्रेता युग में परमात्मा कबीर मुनींद्र नाम से आए थे उस समय एक लीलामय तरीके से बंके नाम की एक प्यारी आत्मा को अपनी शरण में लिया,सत्य ज्ञान समझाया ओर पार किया*

🎉परमेश्वर कबीर साहिब जी चारों युगों में नामांतर करके शिशु रूप में प्रकट होते हैं और एक-एक शिष्य बनाते हैं जिससे कबीर पंथ का प्रचार होता है।
सतयुग - सहते जी
त्रेता - बंके जी
द्वापर - चतुर्भुज जी
कलियुग - धर्मदास जी


🎉कलयुग में कबीर परमेश्वर अपने वास्तविक नाम कबीर रूप में काशी नगरी में लहरतारा तालाब में कमल के पुष्प पर अवतरित हुए।
कलयुग में निसंतान दंपति नीरू और नीमा ने उनका पालन पोषण किया।


🎉परमेश्वर कबीर जी त्रेतायुग में ऋषि मुनीन्द्र जी के रूप में लीला करने आए तब हनुमान जी से मिले। तथा सतलोक के बारे में बताया हनुमानजी को विश्वास हुआ कि ये परमेश्वर हैं। सत्यलोक सुख का स्थान है। परमेश्वर मुनीन्द्र जी से दीक्षा ली। अपना जीवन धन्य किया। मुक्ति के अधिकारी हुए।

🎉द्वापर युग में कबीर परमेश्वर की दया से पांडवों का अश्वमेध यज्ञ संपन्न हुआ।
पांडवों की अश्वमेघ यज्ञ में अनेक ऋषि, महर्षि, मंडलेश्वर  उपस्थित थे यहां तक कि भगवान कृष्ण भी उपस्थित थे फिर भी उनका शंख नहीं बजा।
कबीर परमेश्वर ने सुदर्शन सुपच वाल्मीकि के रूप में शंख बजाया और पांडवों का यज्ञ संपन्न किया।
गरीबदास जी महाराज की वाणी में इसका प्रमाण है
"गरीब सुपच रुप धरि आईया, सतगुरु पुरुष कबीर, तीन लोक की मेदनी, सुर नर मुनि जन भीर"

Wednesday, 20 May 2020

श्री नानक जी द्वारा श्राद्ध भ्रम खण्डन’’


 सिक्ख धर्म के प्रवर्तक श्री नानक देव साहेब जी की जीवनी में एक घटना ऐसी है जिसका वर्णन करता हूँ जो पवित्र पुस्तक ‘‘भाई बाले वाली जन्म साखी श्री नानक देव’’ में लिखी है जिसकी हैडिंग है
 ‘‘आगे साखी दुनिचंद खत्री नाल होई’’।

संक्षिप्त प्रकरण इस प्रकार है :-

श्री नानक जी को परमात्मा (परम अक्षर ब्रह्म) बेई नदी पर उस समय मिले थे, जिस समय श्री नानक जी सुलतानपुर शहर से सुबह के समय प्रतिदिन की तरह बेई नदी में स्नान करने के लिए गए थे। अन्य नगरवासी भी स्नान कर रहे थे। उस समय परमेश्वर कबीर जी बाबा जिंदा के वेश में आए और श्री नानक जी के साथ दरिया में स्नान करने के बहाने प्रवेश हुए। अन्य उपस्थित व्यक्ति देख रहे थे। दोनों ने दरिया में डुबकी लगाई, परंतु बाहर नहीं आए।
दोनों को दरिया में डूबा मान लिया गया था। परमेश्वर जी श्री नानक जी की आत्मा को लेकर (शरीर को दूर जंगल में छोड़कर) अपने साथ अपने निवास स्थान सतलोक (सच्चखण्ड)में ले गए। तीन दिन तक काल ब्रह्म के इक्कीस ब्रह्माण्डों, अक्षर पुरूष के सात शंख ब्रह्माण्डों तथा अपने सतलोक के असंख्य ब्रह्माण्डों की स्थिति को आँखों दिखाया।
यथार्थ आध्यात्मिक ज्ञान बताया तथा यथार्थ मोक्ष मंत्र सतनाम (जो दो अक्षर का है जिसमें एक ॐ मंत्र है तथा दूसरा गुप्त है जो उपदेशी को बताया जाता है।) से मुक्ति होना बताया। फिर एक नाम (सारनाम) का विशेष योगदान मानव के मोक्ष की साधना में है, उससे परिचित कराया तथा सतनाम और सारनाम को कलयुग के पाँच हजार पाँच सौ पाँच (5505) वर्ष बीत जाने तक गुप्त रखने की आज्ञा दी।

श्राद्ध आदि कर्मकाण्ड को व्यर्थ बताया और स्वर्ग-नरक को दिखाया। तीसरे दिन श्री नानक जी की आत्मा को शरीर में प्रवेश करके अंतर्ध्यान
हो गए। उसके पश्चात् श्री नानक जी ने अपने दो शिष्यों ‘‘भाई बाला तथा मर्दाना’’ को साथ लेकर प्रभु से प्राप्त यथार्थ ज्ञान व आँखों देखी ऊपर के लोकों की व्यवस्था का प्रचार करने के उद्देश्य से देश-प्रदेश में बारह वर्ष भ्रमण किया।
उसी दौरान लाहौर में एक धनी व्यक्ति दुनिचन्द खत्री की प्रार्थना पर उनके घरग गए। उस दिन सेठ दुनिचन्द खत्री ने अपने पिता जी का श्राद्ध किया था। कई ब्राह्मणों को भोजन करवाया तथा वस्त्र व हजारों रूपये दक्षिणा दी थी। श्री नानक जी ने पूछा कि हे दुनिचन्द! आज किस उपलक्ष्य में इतने पकवान बनाऐ हैं।
दुनिचन्द ने बताया कि महाराज जी! आज मेरे पिता जी का श्राद्ध किया है। श्री नानक जी ने पूछा कि आपके पिता जी कहाँ है? उत्तर दुनिचन्द का कि वे स्वर्गवासी हो चुके हैं। श्राद्ध करने से उनको एक वर्ष तक स्वर्ग में भूख नहीं लगती। यह बात सुनकर श्री नानक जी ने कहा कि हे दुनिचन्द! आपको आपके अज्ञानी गुरूओं ने भ्रमित कर रखा है। आपका पिता जी तो बाघ के शरीर को प्राप्त होकर उस जंगल में एक वृक्ष के नीचे भूख से व्याकुल बैठा है। यदि मेरी बात पर विश्वास नहीं है तो जाँच कर सकते हैं। तू एक व्यक्ति का भोजन तैयार कर, उस जंगल में जा, तेरी दृष्टि पड़ते ही मेरे आशीर्वाद से उस बाघ (सिंह) को मनुष्य बुद्धि आ जाएगी।
उसको अपना पूर्व जन्म भी याद आ जाएगा। दुनिचन्द जी को श्री नानक जी पर पूर्ण विश्वास था कि इन्होंने जो बोल दिया, वह सिद्ध है। इस महात्मा में लोग बड़ी
शक्ति बताते हैं।
दुनिचन्द सेठ एक व्यक्ति का भोजन जो श्राद्ध के बाद बचा था, लेकर उस बताए जंगल में उसी झाड़ के पास गया तो एक सिंह दिखाई दिया जो दुनिचन्द की ओर कुत्ते की तरह दुम हिला-हिलाकर भाव प्रकट करने लगा कि मैं कोई हानि नहीं करूंगा, आ जा मेरे पास। दुनिचन्द सेठ ने भोजन बाघ के सामने थाली में रख दिया। सर्व भोजन बाघ खा गया। दुनिचन्द ने पूछा कि हे पिता जी! आप तो बड़े धर्म-कर्म करते थे। आप तो सदा शाकाहारी रहे थे। आपकी यह दशा कैसे हुई?
श्री नानक महाराज जी की शक्ति से सिंह ने कहा कि बेटा! जब मेरे प्राण निकल रहे थे, उसी समय साथ वाले मकान में माँस पकाया जा रहा था। उसकी गंध मेरे तक आई, मेरे मन में माँस खाने की इच्छा हुई। उसी समय मेरे प्राण निकल गए। जिस कारण से मुझे शेर का शरीर मिला। बेटा दुनिचन्द! आप किसी पूर्ण संत से दीक्षा लेकर अपने जीव का कल्याण करा लेना। मानव जीवन बड़ी कठिनता से मिलता है। यह कहकर शेर जंगल की ओर गहरा चला गया।
दुनिचन्द ने उन अज्ञानी धर्मगुरूओं को धिक्कारा कि सबको भ्रमित कर रहे हैं। अब विश्वास हुआ कि श्राद्ध करने से कोई लाभ मृतक को नहीं मिलता। घर आकर श्री नानक जी के चरणों में गिरकर अपने कल्याण के लिए यथार्थ भक्ति का ज्ञान तथा मंत्र लेकर आजीवन स्मरण किया तथा सर्व अंधविश्वास वाली साधना त्याग दी जो शास्त्रों के विरूद्ध कर रहा था। मानव जीवन सफल किया।

Saturday, 9 May 2020

पूर्ण गुरु के वचन की शक्ति से भगति होती हैं

गुरू जी से दीक्षा लेकर भक्ति करना लाभदायक है। बिना गुरू के भक्ति करने से कोई लाभ नहीं होता।

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 एक राजा की रानी बहुत धार्मिक थी। उसने परमेश्वर कबीर जी से गुरू दीक्षा ले रखी थी। वह प्रतिदिन गुरू दर्शन के लिए जाया करती थी। राजा को यह अच्छा नहीं लगता था, परंतु वह अपनी पत्नी को वहाँ जाने से रोक नहीं पा रहा था। कारण, एक तो वह उस बड़े शक्तिशाली राजा की लड़की थी, दूसरे वह अपनी पत्नी को प्रसन्न देखना चाहता था।
एक दिन राजा ने अपनी पत्नी से कहा अगर आप नाराज ना हो तो एक बात कहूं?
रानी ने कहा कहो। राजा ने कहा कि आप अपने गुरू के पास जाती हैं, भक्ति तो गुरू के बिना भी हो सकती है। रानी ने कहा कि गुरू जी ने बताया है कि गुरू के बिना भक्ति करना व्यर्थ है। राजा ने कहा कि मैं तेरे साथ कल तेरे गुरू जी  से मिलूँगा, उनसे यह बात स्पष्ट करूँगा।
राजा ने सन्त जी से प्रश्न किया कि आप जनता को मूर्ख बना रहे हो कि गुरू बिन भक्ति नहीं होती, क्यों भक्ति सफल नही होती? नाम मन्त्रा जाप करने होते हैं। एक-दूसरे से पूछकर जाप कर लें, पर्याप्त है। 
सन्त ने कहा राजन्! आपकी बात में दम है, मैं आपके राज दरबार में आऊँगा। वहाँ इस बात का उत्तर दूँगा।
निश्चित दिन को सन्त जी राजा के दरबार में गए। राजा सिंहासन पर विराजमान था, आस-पास सिपाही खड़े थे। संत के बैठने के लिए अलग से कुर्सी रखी थी।
सन्त ने जाते ही आस-पास खड़े सिपाहियों से राजा की ओर हाथ करके कहा कि  इसे गिरफ्तार कर लो। सिपाही टस से मस नहीं हुए। सन्त ने लगातार तीन बार
यही वाक्य, आदेश दोहराया कि इसे गिरफ्तार कर लो, परन्तु राजा को सिपाहियों ने गिरफ्तार नहीं किया।
राजा को सन्त पर क्रोध आया कि यह कमबख्त मेरी पत्नी को इसलिए बहका रहा था कि इसके राज्य को प्राप्त कर लूँ।  
 राजा ने एक बार कहा कि सिपाहियो इसे गिरफ्तार कर लो। राजा के हाथ का सन्त की ओर संकेत था। उसी
समय सिपाहियों ने सन्त को गिरफ्तार कर लिया।
सन्त ने कहा कि हे राजन्! आप घर पर बुलाकर सन्त का अनादर कर रहे हो, यह अच्छी बात नहीं। राजा ने कहा आप यह क्या बकवास कर रहे थे। मुझे गिरफ्तार करने का आदेश दे रहे हो। सन्त ने कहा मैं आपके उस प्रश्न का उत्तर दे रहा था कि गुरू से दीक्षा लेकर भक्ति करना क्यों लाभदायक है? मुझे छूटाओ तो मैं आपको उत्तर दूँ। राजा ने सिपाहियों से कहा कि छोड़ दो। सिपाहियों ने सन्त को छोड़ दिया। सन्त ने कहा कि हे राजा जी! मैंने यही वाक्य कहा था, “इसे गिरफ्तार कर लो।” सिपाही टस से मस नहीं हुए। आप जी ने भी यही वाक्य कहा था कि तुरंत सिपाहियों ने मुझे गिरफ्तार कर लिया। आपके वचन में राज की शक्ति है। मेरे वचन में आध्यात्मिक शक्ति है। आप उसी नाम-जाप के लिए किसी को भक्ति के लिए कहोगे तो वह मन्त्रा कोई कार्य नहीं करेगा। मैं वही नाम जाप करने को कहूँगा, वह तुरन्त प्रभाव से क्रियावान होगा। इसलिए पूर्ण सन्त से दीक्षा लेने से साधक में तुरंत आध्यात्मिक प्रक्रिया प्रारम्भ हो जाती है, उसकी आत्मा में भक्ति का अंकुर निकल आता है। 

Friday, 8 May 2020

क्या गुरु बनाए बिना मोक्ष नहीं मिलता?

            गुरु बिन मोक्ष नहीं

प्रश्न :- क्या गुरू के बिना भक्ति नहीं कर सकते?
उत्तर :- भक्ति कर सकते हैं, परन्तु व्यर्थ प्रयत्न रहेगा।
प्रश्न :- कारण बताऐं?
उत्तर :- परमात्मा का विधान है जो सूक्ष्मवेद में कहा है :-
कबीर, गुरू बिन माला फेरते, गुरू बिन देते दान।
गुरू बिन दोंनो निष्फल है, पूछो वेद पुराण।।
कबीर, राम कृष्ण से कौन बड़ा, उन्हों भी गुरू कीन्ह।
तीन लोक के वे धनी, गुरू आगे आधीन।।
कबीर, राम कृष्ण बड़े तिन्हूं पुर राजा। तिन गुरू बन्द कीन्ह निज काजा।।
भावार्थ :- गुरू धारण किए बिना यदि नाम जाप की माला फिराते हैं और
दान देते हैं, वे दोनों व्यर्थ हैं। यदि आप जी को संदेह हो तो अपने वेदों तथा
पुराणों में प्रमाण देखें।
श्रीमद् भगवत गीता चारों वेदों का सारांश है। गीता अध्याय 2 श्लोक 7 में
अर्जुन ने कहा कि हे श्री कृष्ण! मैं आपका शिष्य हूँ, आपकी शरण में हूँ। गीता
अध्याय 4 श्लोक 3 में श्री कृष्ण जी में प्रवेश करके काल ब्रह्म ने अर्जुन से कहा
कि तू मेरा भक्त है। पुराणों में प्रमाण है कि श्री रामचन्द्र जी ने ऋषि वशिष्ठ जी
से नाम दीक्षा ली थी और अपने घर व राज-काज में गुरू वशिष्ठ जी की आज्ञा
लेकर कार्य करते थे। श्री कृष्ण जी ने ऋषि संदीपनि जी से अक्षर ज्ञान प्राप्त किया
तथा श्री कृष्ण जी के आध्यात्मिक गुरू श्री दुर्वासा ऋषि जी थे।
कबीर परमेश्वर जी हमें समझाना चाहते हैं कि आप जी श्री राम तथा श्री
कृष्ण जी से तो किसी को बड़ा अर्थात् समर्थ नहीं मानते हो। वे तीन लोक के
मालिक थे, उन्होंने भी गुरू बनाकर अपनी भक्ति की, मानव जीवन सार्थक किया।
इससे सहज में ज्ञान हो जाना चाहिए कि अन्य व्यक्ति यदि गुरू के बिना भक्ति
करता है तो कितना सही है? अर्थात् व्यर्थ है।

गुरू के बिना देखा-देखी कही-सुनी भक्ति को लोकवेद के अनुसार भक्ति कहते हैं। लोकवेद का अर्थ है, किसी क्षेत्रा में प्रचलित भक्ति का ज्ञान जो
तत्वज्ञान के विपरीत होता है। 
लोकवेद के आधार से यह दास (संत रामपाल दास)श्री हनुमान जी, बाबा श्याम जी, श्री राम, श्री कृष्ण, श्री शिव जी तथा देवी-देवताओं की भक्ति करता था। हनुमान जी की भक्ति में मंगलवार का व्रत,बुन्दी का प्रसाद बाँटना, स्वयं देशी घी का गिच चुरमा खाता था, बाबा हनुमान को डालडा वनस्पति घी से बनी बुन्दी का भोग लगाता था। हरे राम, हरे कृष्ण,कृष्ण-कृष्ण हरे-हरे का मन्त्रा जाप करता था।
 किसी ने बता दिया कि :-
ओम् नाम सबसे बड़ा, इससे बड़ा न कोय।
ऊँ नाम का जाप करे, तो शुद्ध आत्मा होय।।
इस कारण से ओम् नाम का जाप शुरू कर दिया। ओम् नमो शिवायः, यह शिव का मन्त्र जाप करता था। ओम् भगवते वासुदेवायः नमः, यह विष्णु जी का जाप करता था। तीर्थों पर जाना, दान करना, वहाँ स्नान करना, यह भी लोकवेद के आधार से करने जाता था।
जैसे घर में सुख होते थे तो मैं मानता था कि ये सब मेरी उपरोक्त भक्ति के कारण हो रहे हैं। जैसे कक्षा में पास होना, विवाह होना, पुत्र तथा पुत्रियों का जन्म होना, नौकरी लगना। ये सर्व सुख उपरोक्त साधना से ही मानता था। 

कबीर परमेश्वर जी ने सूक्ष्म वेद में कहा है :-
कबीर, पीछे लाग्या जाऊं था, मैं लोक वेद के साथ।
रास्ते में सतगुरू मिले, दीपक दीन्हा हाथ।।

भावार्थ है कि साधक लोकवेद अर्थात् दन्त कथा के आधार से भक्ति कर रहा था। उस शास्त्राविरूद्ध साधना के मार्ग पर चल रहा था। रास्ते में अर्थात् भक्ति मार्ग में एक दिन तत्वदर्शी सन्त मिल गए। उन्होंने शास्त्राविधि अनुसार शास्त्रा प्रमाणित साधना रूपी दीपक दे दिया अर्थात् सत्य शास्त्रानुकूल साधना का ज्ञान कराया तो जीवन नष्ट होने से बच गया। सतगुरू द्वारा बताये तत्वज्ञान की रोशनी में पता चला कि मैं गलत भक्ति कर रहा था।

       श्री मद्भगवत गीता अध्याय 16 श्लोक 23.
24 में कहा है कि शास्त्रा विधि को त्यागकर जो साधक मनमाना आचरण करते हैं, उनको न तो सुख होता है, न सिद्धि प्राप्त होती है और न ही गति अर्थात् मोक्ष की प्राप्ति होती है अर्थात् व्यर्थ साधना है।

        फिर गीता अध्याय 16 श्लोक 24 में कहा
है कि अर्जुन! इससे तेरे लिए कृर्तव्य और अकृर्तव्य की व्यवस्था में शास्त्र ही प्रमाण हैं।
जो उपरोक्त साधना यह दास (संत रामपाल दास) किया करता था तथा पूरा हिन्दू समाज कर रहा है, वह सब गीता-वेदों में वर्णित न होने से शास्त्र विरूद्ध साधना हुई जो व्यर्थ है।
कबीर, गुरू बिन काहु न पाया ज्ञाना, ज्यों थोथा भुस छडे़ मूढ़ किसाना।
कबीर, गुरू बिन वेद पढै़ जो प्राणी, समझै न सार रहे अज्ञानी।।
इसलिए गुरू जी से वेद शास्त्रों का ज्ञान पढ़ना चाहिए जिससे सत्य भक्ति
की शास्त्रानुकूल साधना करके मानव जीवन धन्य हो जाए।

Thursday, 7 May 2020

सर्वानंद की कथा

एक बार सर्वानंद नाम का एक बड़ा विद्वान पंडित था उसने शास्त्रार्थ में सभी विद्वानों को हरा दीया ओर अपनी माँ शारदा के पास आया ओर बोला मा मैने सबको ज्ञान में हरा दीया मेरे समान इस पृथ्वी पर अब कोई विद्वान नही है इसलिये आप आज से मेरा नाम सर्वानंद से बदलकर सर्वजीत रख दो 
सर्वानंद‌ की मां‌ को शरीर में‌ भंयकर दर्द रहता था उसने तरह तरह के ईलाज करवा लिये पर कोई आराम नही मिला एक दिन उसने कबीर साहब का सत्संग एक बहन से सुना और वह भी सत्संग में पहुंच गयी सत्संग के समाप्त मे वो कबीर साहब को अपने‌ कष्ट के लिये प्रार्थना करने गयी उसने पहले चरण स्पर्श किये जैसे ही कबीर परमेश्वर ने उस पर आशीर्वाद का हाथ रखा वो कष्ट शरीर से छूमंतर हो गया यह समझ शारदा समझ गयी यह कोई परम शक्ति ही है ।

अब शारदा को पता था कि स्वयं पूर्ण ब्रह्म  कबीर जी के रूप में कांशी में आए हुए है इसलिए शारदा कहती है बेटा कांशी में एक कबीर नाम का संत है तू उसको ज्ञान चर्चा में हरा देना फिर में तेरा नाम सर्वजीत रख दूंगी ओर सुन में तुम पर ऐसे यकीन नही करूंगी आप कबीर जी से लिखित में लेकर आना की आप जीत गए  

अब सर्वानंद गीता चारो वेद आदि आदि सभी धार्मिक पुस्तको को एक बैलगाड़ी में भरता है और चल पड़ता है काशी की तरफ  सर्वानंद को कांशी में पहुचते पहुचते बहुत जोर की प्यास लग जाती है और ऐसी हालत हो जाती है कि अगर कुछ देर ओर पानी नही मिला तो मानो प्राण निकल जाएंगे 

तभी सर्वानंद को सामने एक लड़की  कुए पर पानी भरती नजर आती है  जो कबीर परमात्मा की धर्म पुत्री कमाली थी जिसे कबीर परमात्मा ने कब्र से निकाल कर सबके सामने जिंदा किया था अब सर्वानंद कमाली के पास जाता है और कहता है कि बहन मुझे जल्दी से पानी पिला दो कमाली कहती है पण्डित जी पानी पीने से पहले मेरी बात सुनो लेकिन सर्वानंद कहता है कि मेरे प्राण जाने वाले है आप पहले मुझे थोड़ा सा पानी पिला दो फिर में आपकी बात सुनेगा अब कमाली सर्वानंद को पानी पिला देती है 

पानी पीकर सर्वानंद कहता है अब बोलो आप क्या कहना चाहती हो कमाली कहती है कि में तो आपको ये कहना चाहती थी कि ये हरिजनों की बस्ती है और ये कुआ भी हरिजनों का है और आप मुझे पण्डित लग रहे हो कमाली की इतनी बात सुनकर सर्वानंद गुस्सा हो जाता है कि तुम मुझे पहले नही बता सकती थी  कि ये हरिजनों का कुआ है तुमने मेऱा धर्म भरष्ट करवा दिया हम पंडित  नीच जाती वालो के हाथ से कभी कुछ खाते पीते नही हैअब कमाली कहती है कि सर्वानंद जी मैने तो आपको पहले ही बताना चाहा था पर उस समय तो आपके प्यास से प्राण जाने वाले थे इसलिए आपने मेरी बात सुनी ही नही ओर अब आप पंडित का रोब जाड़ रहे हो अगर ऐसे आपका धर्म भ्रष्ट होता है तो आपको पहले पूछ कर पानी पीना चाहिए था 

अब सर्वानंद कहता है चल ठीक है मुझे कबीर जुलाहे के पास जाना है तुम्हे पता है  कबीर कहा रहता है कमाली कहती है चलो मेरे साथ मे भी वही जा रही हु अब कमली ओर सर्वानन्द कबीर जी की कुटिया में पहुचते है कमाली पानी का मटका उतारकर सर्वानंद को कहती है कि पण्डित जी यही है कबीर जी की कुटिया 

अब सर्वानंद एक पानी से पूरा भरा हुआ लोटा देते है और कमाली से कहते है कि ये लोटा कबीर जी को दे देना अब कमाली कबीर जी के पास पानी से भरा लोटा लेकर जाती है कबीर परमात्मा एक कपड़े सिलने की सुई उस लोटे में डालते है और कमाली से कहते है कि जा वापिस इस लोटे को सर्वानंद को दे दे 

 अब कमाली उसे वापिस सर्वानंद के पास लेकर जाती है सर्वानंद कबीर जी से पूछता है कि में लौटे में आपकी सुई डालने का मतलब समझा नही कबीर परमात्मा कहते है कि आपने ये पानी से भरा लोटा मेरे पास क्यों भेज था सर्वानद कहता है कि में इसके माध्यम से आपको ये समझाना चाहता था कि जिस तरह इस पानी के भरे लोटे में एक बूंद भी पानी और नही समा सकता ठीक उसी प्रकार में भी ज्ञान से भरा पड़ा हु  मुझमें भी ओर ज्ञान नही समा सकता इसलिए बिना बहस किये आप ज्ञान चर्चा में हार मान लो कबीर परमात्मा बोले जैसे मेरी डाली हुई सुई लोटे की तली में जा कर टिकी है और तेरा पानी लोटे से बाहर आ गया है ऐसे ही मेरा ज्ञान तुम्हारे अंदर जाकर अपनी जगह बना लेगा और तेरा ये  अज्ञान पानी की तरह बाहर निकल जायेगा  

लेकिन सर्वानंद नही मानता है और ज्ञान चर्चा शुरू होती है अब कबीर परमात्मा सर्वानंद से पूछते है कि 

कौन ब्रह्मा की माँ है कौन विष्णु का बाप 

शंकर का दादा कौन है हम को बता दो आप  

अब सर्वानंद के पास इसका जबाब तो था नही जोर जोर से धारावाहिक संस्कृत बोलने लग जाता है अब उस समय ज्ञान चर्चा का फैसला अनपढ़ लोग करते थे  अनपढ़ लोगो ने देखा कि वह सर्वानंद कितनी धारावाहिक संस्कृत बोल रहा है  इसलिए सर्वानंद जीत गया  

अब कबीर परमात्मा ने सोचा  इस मूर्ख से क्या ज्ञान चर्चा करू में इससे ब्रह्मा विष्णु और शिव के माता पिता का नाम पूछ रहा हु ओर ये मूर्ख कुछ और ही बके जा रहा है इसलिए कबीर परमात्मा बोले भाई सर्वानन्द जी में हार गया और आप जीत गए 

अब सर्वानन्द बोला कबीर जी ऐसे मेरी माँ नही मानेगी आप लिख कर दे दो कबीर पमात्मा बोले भाई में तो अनपढ़ हु आप लिख लो में अपना अंगूठा लगा दूंगा जहा आप कहोगे अब सर्वानन्द लिखता है कि ज्ञान चर्चा में कबीर जी हार गए और सर्वानन्द जीत गया और कबीर जी का अंगूठा लगवा कर अपनी माँ शारदा के पास जाता है 

अब सर्वानन्द अपनी माँ से कहता है मै मैन कबीर जी को ज्ञान चर्चा में हरा दिया है अब आप मेरा नाम सर्वजीत रख दो शारदा कहती है ऐसे नही मैने कहा था तुम कबीर जी से लिखवा कर लाना सर्वानन्द कहता है मै में लिखवा कर लाया हूं

 अब शारदा कहती है कि पढ़ कर सुना अब सर्वानन्द जब पढ़ता है तो उसमें लिखा था कि ज्ञान चर्चा में सर्वजीत हार गया और कबीर जी जीत गए 
अब सर्वानन्द कहता है  लगता है लिखने में गलत्ति हो गई में दुबारा लिखवा कर लाता हूं 

ये कहकर सर्वानन्द फिर कबीर जी के पास जाता है कबीर जी कहते है कोई बात नही सर्वानन्द दुबारा लिख ले भाई में फिर अंगूठा लगा देता हूं अब दुबारा लिख कर कबीर जी का अंगूठा लगवाकर  फिर सर्वानन्द अपनी माँ के पास आता है और पढता है तो फिर वही लिखा था कि ज्ञान चर्चा में सर्वानन्द हार गया और कबीर जी जीत गए 

अब सर्वानन्द अपनी माता शारदा को कहता है कि लगता है मुझसे लिखने में फिर भूल हो गई इसलिए इस बार कोई गलत्ति नही करूंगा ओर फिर कबीर परमात्मा के पास गया कबीर परमात्मा फिर बोले कि सर्वानन्द कोई बात नही एक बार फिर लिख ले में अंगूठा लगा दूंगा अबकी बार  सर्वानन्द उन्ही लाइन को पढ़ता पढता अपनी माता के पास जाता है ओर क्या देखता है कि उसकी आँखों के सामने ही शब्द बदल जाते है

 अब शारदा सर्वानन्द से कहती है मूर्ख कबीर जी स्वयं पूर्ण ब्रह्म है जाकर उनके पैर पकड़ कर माफी मांग और अपने इस आधे अधूरे ज्ञान को छोड़कर पूर्ण परमात्मा कबीर से पांचवे वेद सूक्षम वेद का ज्ञान समझ और उनसे नाम दीक्षा लेकर मर्यादा में रहकर मोक्ष प्राप्त करके अपने असली घर सतलोक चल  

तब सर्वानन्द जी कबीर परमात्मा के पैरो में गिरकर माफी मांगता है और उनसे नाम दीक्षा लेकर पूर्ण ब्रह्म कबीर साहेब की शरण ली।

अवश्य देखिये-  साधना टी. वी. शाम 7:30 से 8:30 तक
Visit - www.jagatguturampalji.org

Wednesday, 6 May 2020

विवाह केसे करें

"विवाह केसे करें???""

 जैसे श्री देवी दुर्गा जी ने अपने तीनों पुत्रों (श्री ब्रह्मा जी, श्री विष्णु जी तथा श्री शिव जी) का विवाह किया था, इसी पुस्तक में आगे पढ़ेंगे। मेरे (लेखक के) अनुयाई ऐसे ही क हीरते हैं। 17 मिनट की असुर निकंदन रमैणी है। फेरों के स्थान पर उसको बोला जाता है जो करोड़ गायत्री मंत्रो (भूर्भवः ...) से उत्तम तथा लाभदायक है। जिसमें विश्व के सर्व देवी-देव तथा पूर्ण परमात्मा का आह्वान तथा स्तुति-प्रार्थना है। जिस कारण से सर्व शक्तियां उस विवाह वाले जोड़े की सदा रक्षा तथा सहायता करते हैं। इससे बेटी बची रहेगी। जीने की सुगम राह हो जाएगी



 में प्रचलित वर्तमान परंपरा का त्याग :- विवाह में व्यर्थ का खर्चा त्यागना पड़ेगा। जैसे बेटी के विवाह में बड़ी बारात का आना, दहेज देना, यह व्यर्थ परंपरा है। जिस कारण से बेटी परिवार पर भार मानी जाने लगी है और उसको गर्भ में ही मारने का सिलसिला शुरू है जो माता-पिता के लिए महापाप का कारण बनता है। बेटी देवी का स्वरूप है। हमारी कुपरम्पराओं ने बेटी को दुश्मन बना दिया। श्री देवीपुराण के तीसरे स्कंद में प्रमाण है कि इस ब्रह्माण्ड के प्रारम्भ में तीनों देवताओं (श्री ब्रह्मा जी, श्री विष्णु जी तथा श्री शिव जी) का जब इनकी माता श्री दुर्गा जी ने विवाह किया, उस समय न कोई बाराती था, न कोई भाती था। न कोई भोजन-भण्डारा किया गया था। न डी.जे बजा था, न कोई नृत्य किया गया था। श्री दुर्गा जी ने अपने बड़े पुत्र श्री ब्रह्मा जी से कहा कि हे ब्रह्मा! यह सावित्रा नाम की लड़की तुझे तेरी पत्नी रूप में दी जाती है। इसे ले जाओ और अपना घर बसाओ। इसी प्रकार अपने बीच वाले पुत्र श्री विष्णु जी से लक्ष्मी जी तथा छोटे बेटे श्री शिव जी को पार्वती जी को देकर कहा कि ये तुम्हारी पत्नियां हैं। इनको ले जाओ और अपना-अपना घर बसाओ। तीनों अपनी-अपनी पत्नियों को लेकर अपने-अपने लोक में चले गए जिससे विश्व का विस्तार हुआ।

Mahashivratri kab h

शिवरात्रि का व्रत Mahashivratri जैसे ही शिवरात्रि नजदीक आती है हर शिवभक्त के मन मे भक्ति भाव की लहर दौड़ पड़ती है। कोई पूछता है कि शिव...